भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८१६ | भैषज्यरत्नावली । | [गुल्मरोग-]
यता, निसोत, दन्ती, नीमकी छाल, सेंधानमक और अभ्रकभस्म इन सब ओषधि-धियोंको दो दो तोले कुटापिसा चूर्ण तथा लोहभस्म ८ तोले और घृत १६ तोले डालकर यथाविधि पकावे । इस रसनामृत लोहको सब रोगमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ८९-९२ ॥
गुल्मं पञ्चविधं हन्ति यकृत्प्लीहोदराणि च ।
कामलां पाण्डुरोगं च शोथं जीर्णज्वरं तथा ॥
रोगान्सर्वांन्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ९३ ॥
सूर्यनारायण जैसे अन्धकारके समूहको नष्ट करते हैं वैसेही यह ओषधि पाँच प्रकारके गुल्म, जिगर, तिल्ली, उदररोग, कमलवाय , पाण्डु, शोथ, जीर्ण ज्वर और अन्यान्य सर्व प्रकारके रोगोंको शीघ्र नाश करती है ॥ ९३ ॥
दन्तीहरीतकी ।
जलद्रोणे विपक्तव्या विंशतिः पञ्च चाभया ।
दन्त्याः पलानि तावन्ति चित्रकस्य तथैव च ॥ ९४ ॥
तेनाष्टभागशेषेण पचेद्दन्तीसमं गुडम् ।
ताश्चाभयास्त्रिवृच्चूर्णं तैलाच्चापि चतुःपलम् ॥ ९५ ॥
पलमेकं कणाशुण्ठ्योः सिद्धे लेहे च शीतलम् ।
क्षौद्रं तैलसमं दद्याच्चातुर्जातपलं तथा ॥ ९६ ॥
पोटलीमें बँधीहुई हरड २५ पल, दन्तीकी जड २५ पल और चीतेकी जड २५ पल लेवे । सबको एकत्र ३२ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते ४ सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे और पोटलीमेंसे हरडोंको निकालकर गुठली निकाल डाले । तदनन्तर गुड २५ पल, काढेमेंसे निकालीहुई सब हरड निसोतका चूर्ण १६ तोले, तिलका तेल १६ तोले, पीपल और सोंठ चार चार तोले इन सबको पूर्वोक्त क्वाथमें डालकर अच्छे प्रकार पकावे । जब पककर अवलेहकी समान गाढा होजाय तब उतारले, शीतल होजानेपर उसमें शहद १६ तोले और चातुर्जातकका चूर्ण चार तोले मिलादेवे ॥ ९४-९६ ॥
ततो लेहपलं लीढ्वा जग्ध्वा चैकां हरीतकीम् ।
सुखं विरिच्यते स्निग्धो दोषप्रस्थमनामयः ॥ ९७ ॥
प्लीहश्वयथुगुल्मार्शोहृत्पाण्डुग्रहणीगदाः ।
शाम्यन्त्युत्क्लेशविषमज्वरकुष्ठान्यरोचकाः ॥ ९८ ॥