भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ शूलरोग- |
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छायाशुष्का वटी कार्या नाम्नेदमर्जुनाह्वयम् ।
हृद्रोगं सर्वशूलाशहृल्लासच्छर्द्यरोचकान् ॥ २७ ॥
अतीसारमग्निमान्द्यं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् ।
शोथोदराम्लपित्तं च विषमज्वरमेव च ॥
हन्त्यन्यानपि रोगांश्च बल्यं वृष्यं रसायनम् ॥ २८ ॥
हजार पुटों द्वारा शुद्ध कीहुई वज्राभ्रकभस्मको अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें सात दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करके छायामें सुखाकर गोलियाँ बनालेवे । यह नागार्जुन नामकी अभ्रक हृदयरोग, सर्वप्रकारक शूल, अर्श, हृल्लास, वमन, अरुचि एवं अन्य नाना प्रकारकी व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करती है तथा बल्य, पुष्टिकर और रसायन है ॥ २६–२८ ॥
हृदयार्णवरस !
सूतार्कगन्धकं क्वाथे वराया मर्दयेद्दिनम् ।
काकमाच्या वटीं कृत्वा चणमात्रां च भक्षयेत् ।
हृदयार्णवनामाऽयं हृद्रोगदलनो रसः ॥ २९ ॥
शुद्ध पारा, ताँबा और शुद्ध गन्धक इनको समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथ और मकोयके रसमें एक दिनतक विधिपूर्वक खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । नित्यप्रति एक एक गोली सेवन करनेसे हृदयार्णवनामवाला यह रस हृदय रोगको नष्ट करताहै ॥ २९ ॥
पञ्चाननरस ।
सूतगन्धौ द्रवैर्धात्र्या मर्दयेद्गोस्तनीद्रवैः ।
यष्टिखर्जूरसलिलैर्दिनं च परिमर्दयेत् ॥
धात्रीचूर्णं सितां चानु पिबेद्धृद्रोगशान्तये ॥ ३० ॥
पारे और गन्धकको बराबर २ लेकर आमलोंके रसमें खरल करके दाख मुलहठी और खजूरके क्वाथमें एक दिनतक यथाविधि खरल करे । इस रसको प्रतिदिन दो दो रत्तीभर, आमलोंके चूर्ण और मिश्रीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे हृदयरोग शान्त होताहै ॥ ३० ॥
प्रभाकरवटी ।
माक्षिकं लोहमभ्रं च तुगाक्षीरं शिलाजतु ।
क्षिप्त्वा खल्लोदरे पश्चाद्भावयेत्पार्थवारिणा ॥ ३१ ॥