भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८२८ | भैषज्यरत्नावली । | [ हृद्रोग • |
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कर्पूरसलिलेनाथ भावयित्वा यथाविधि ।
रक्तिकैकप्रमाणेण विदध्याद्वटिकास्ततः ॥ ३९ ॥
अयं विश्वेश्वरो नाम रसः फुप्फुसजान् गदान् ।
हृद्रोगांश्च जयेत्सर्वान् संशयोऽत्र न विद्यते ॥ ४० ॥
सोना, अभ्रक, लोहा, वङ्ग, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और वैक्रान्तमणि इन सब द्रव्योंकी भस्मको एक एक तोला लेकर कपूरके जलमें विधिपूर्वक खरल करके एक एक रत्ती की गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन नियमानुसार सेवन करनेसे यह विश्वेश्वर-नामक रस फुप्फुससे उत्पन्न हुए रोगों और समस्त हृदयरोगोंको शीघ्र जीतता है । इसमें कुछ सन्देह नहीं है ॥ ३८-४० ॥
शङ्करवटी ।
रसस्य भागाश्चत्वारो बलेरष्टौ तथा मताः ।
त्रयो लौहस्य नागस्य द्वावित्येकत्र मर्दयेत् ॥ ४१ ॥
भावयेत्काकमाच्याश्च चित्रकस्यार्द्रकस्य च ।
स्वरसेन जयन्त्याश्च वासाया बिल्वपार्थयोः ॥ ४२ ॥
ततो गुञ्जाद्वयमितां विदध्याद्वटिकां भिषक् ।
एकैकां दापयेदासामीषदूष्णेन वारिणा ॥ ४३ ॥
शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले, लोहा ३ तोले और शीशा दो तोले इन सबको एकत्रितकर मकोय, चीता, अदरख, जयन्ती, अडूसा, बेलकी छाल और अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें यथाक्रम भावना देकर अच्छी तरह खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे हररोज एक एक गोली सुखोष्ण जलके साथ सेवन करे ॥ ४१–४३ ॥
जयेदियं फुप्फुसजान् रोगान् हृदयसम्भवान् ।
जीर्णज्वरं तथा घोरं प्रमेहानपि विंशतिम् ॥ ४४ ॥
कासश्वासामवातांश्च ग्रहणीमपि दुस्तराम् ।
वटी श्रीशङ्करप्रोक्ता बलपुष्टिविवर्द्धिनी ॥ ४५ ॥
यह वटी फुप्फुसजन्यरोग, हृदयगतरोग, पुराना ज्वर, बीसों प्रमेह, खाँसी, श्वास, आमवात और दुस्तर संग्रहणी आदि रोगोंको तत्काल नष्ट करती है । यह वटी श्रीशङ्कर भगवान्ने की है । यह अतिबलकारक और पुष्टिकर है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥