भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 867, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 867

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८३५

गोखुरू, अमलतास, डाभ, काँस, धमासा, पाषाणभेद, और हरड इनको समान भाग लेकर कूट पीसकर चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करे तो अश्मरी और मृत्युके समान प्राप्त हुई मूत्रकृच्छ्रकी पीडा नष्ट होती है ॥ १६ ॥

धात्र्यादि ।

धात्री द्राक्षा विदारी च यष्ट्याह्वं गोक्षुरं तथा ।
एभिः कषायं विपचेत्पिबेच्छीतं सशर्करम् ॥
अपि योगशतासाध्यं मूत्रकृच्छ्रं जयेल्लघु ॥ १७ ॥

आमला, दाख, विदारीकन्द, मुलहठी और गोखुरू इनका काढा बनाकर शीतल होनेपर मिश्री डालकर पीवे । जो सैकडों योगोंसे भी असाध्य हो ऐसे मूत्रकृच्छ्रको यह छोटासा प्रयोग नष्ट कर देता है ॥ १७ ॥

बृहद्धात्र्यादि ।

धात्री द्राक्षा च यष्ट्याह्वं विदारी सत्रिकण्टका ।
दर्भैक्षुमूलमभया क्वाथयित्वा जलं पिबेत् ॥
ससितं मूत्रकृच्छ्रघ्नं रुजं दाहहरं परम् ॥ १८ ॥

आमला, दाख, मुलहठी, विदारीकन्द, गोखुरू, डाभ, ईखकी मूल और हरड इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर मिश्री डालकर पीनेसे अत्यन्त दाहयुक्त मूत्रकृच्छ्र-रोग शमन होता है ॥ १८ ॥

अमृतादि ।

अमृता नागरं धात्री वाजिगन्धा त्रिकण्टकम् ।
प्रपिबेद्वातरोगार्त्तः सशूलो मूत्रकृच्छ्रवान् ॥ १९ ॥

गिलोय, सोंठ, आमले, असगन्ध और गोखुरू इनके क्वाथको पान करनेसे शूलसहित मूत्रकृच्छ्ररोग व वातरोग शान्त होता है ॥ १९ ॥

शतावर्यादि ।

शतावरी काशकुशश्वदंष्ट्राविदारिशालीक्षुकशेरुकाणाम् ।
क्वाथं सुशीतं मधुशर्कराक्तं पिबञ्जयेत्पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रम् ॥ २०॥

शतावर, काँस, कुशा, गोखुरू, विदारीकन्द, शालिके चावल, ईखकी जड और कसेरू इनके क्वाथको विधिपूर्वक बनावे । जब शीतल होजाय तब शहद और चीनी मिलाकर पीवे । इससे पित्तसे हुआ मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ २० ॥