भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८३७
वङ्ग, पारा और गन्धक इनको समान भाग लेकर लोहेके पात्रमें रख दूर्वा, मुल- हठी, गोखुरू और शेमलकी जड इनके क्वाथसे अच्छे प्रकार खरल करे । फिर मूषायन्त्रमें रखकर भूधरयन्त्रमें पकावे । जब शीतल होजाय तब इसको निकालकर उपर्युक्त औषधियोंके क्वाथमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । तद- न्तर दूब, मुलहठी और शेमलकी जडका क्वाथ एवं दूध ये सब बराबर बराबर लेकर खीर बनावे । नित्यप्रति एक एक गोली इसी खीरके साथ खाय । प्रातःसमय औषधि सेवन करके शीतल जल पीनेसे जब पेशाब होगा तब रोगी सुखी होगा । यह मूत्रकृच्छ्रको नष्ट करनेके लिये उत्तम है ॥ २६ ॥ २७ ॥
मूत्रकृच्छ्रान्तकरस १-२ ।
शतावरीरसैः पिष्ट्वा मृतसूतं च तालकम् ।
शिखिचुत्थं च तुल्यांशं दिनैकं मर्दयेद्दृढम् ॥ २८ ॥
तद्गोलं सार्षपे तैले पाच्यं यामं च चूर्णयेत् ।
मूत्रकृच्छ्रान्तकश्चास्य क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ २९ ॥
भक्षणान्नात्र सन्देहो मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्यलम् ।
तुलसीतिलपिण्याकं बिल्वमूलं तुषाम्बुना ॥
कर्षैकं वाऽनुपानेन सुरया वा सुवर्चलैः ॥ ३० ॥
१—पारेकी भस्म, हरताल और शुद्ध नीलाथोथा इनको समान भाग लेवे । फिर सबको शतावरके रसमें एक दिनतक उत्तम प्रकार खरल करके गोलासा बनालेवे । इस गोलेको सरसोंके तेलमें एक प्रहरतक पकावे और शीतल होजानेपर चूर्ण करलेवे । इस प्रकार यह मूत्रकृच्छ्रान्तक रस सिद्ध होता है। इसको नित्यप्रति प्रातःकाल चार चार रत्ती प्रमाण शहदमें मिलाकर खानेसे निस्सन्देह समस्त मूत्रकृच्छ्र नष्ट होते हैं । अनुपान—तुलसीका रस, तिलकी खल और बेलकी जडके क्वाथको तुषाम्बुनामवाली काँजीमें अथवा मदिरामें हुलहुलका रस मिलाकर एकएक कर्षकी मात्रासे पान करे ॥ २८–३० ॥
सूतं स्वर्णं च वैक्रान्तं गन्धतुल्यं विमर्दयेत् ।
चण्डाली-राक्षसीद्रावैर्द्वियामान्ते तुगोलकम् ॥ ३१ ॥
शुष्कं बद्ध्वा पुटेच्चाह्नः करीषाग्नौ महापुटे ।
माषमात्रं लिहेत्क्षौद्रैर्मूत्रकृच्छ्रप्रशान्तये ॥ ३२ ॥