भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८५३
वरुणादि ।
वरुणस्य त्वचं श्रेष्ठां शुण्ठीगोक्षुरसंयुताम् ।
यवक्षारं गुडं दत्त्वा क्वाथयित्वा जलं पिबेत् ॥
अश्मरीं वातजां हन्ति चिरकालानुबन्धिनीम् ॥ ५ ॥
उत्तम वरनाकी छाल, सोंठ, गोखरूके बीज इनका क्वाथ बनाकर उसमें जवा-खार व गुड डालकर पान करे । इससे वातजन्य बहुत पुरानी पथरी दूर होती है ५॥
बृहद्वरुणादि ।
वारुणं वल्कलं शुण्ठी बीजं गोक्षुरसम्भवम् ।
तालमूली कुलत्थं च कुशादिपञ्चमूलकम् ॥ ६ ॥
शर्कराक्षारसंयुक्तं क्वाथयित्वा जलं पिबेत् ।
अश्मरीमूत्रकृच्छ्रघ्नं वस्तिमेहनशूलनुत ॥ ७ ॥
वरनाकी छाल, सोंठ, गोखरूके बीज, मुसली, कुलथी और कुशादि तृणपञ्चमूल इनके यथाविधि क्वाथको बनाकर चीनी और जवाखार मिश्रित करके पान करनेसे पथरी, मूत्रकृच्छ्र, वस्तिशूल और लिंगशूल नाश होता है ॥ ६ ॥ ७ ॥
शुंठ्यादि ।
शुण्ठ्यग्निमन्थपाषाणशिग्रुवरुणगोक्षुरैः ।
काश्मर्यारग्वधफलैः क्वाथं कृत्वा विचक्षणः ॥ ८ ॥
रामठक्षारलवणचूर्णं दत्त्वा पिबेन्नरः ।
अश्मरीमूत्रकृच्छ्रघ्नं दीपनं पाचनं परम् ॥ ९ ॥
सोंठ, अरणी, पाषाणभेद, सहिंजनेकी छाल, वरनाकी छाल, गोखरू, कुम्हेरकी छाल और अमलतास इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनालेवे । फिर इस क्वाथमें हींग, जवाखार और सेंधनमकका चूर्ण डालकर पीवे तो अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र और समस्त वातविकार दूर होते हैं एवं जठराग्नि दीप्त होती है और पाचन होती है ॥ ८ ॥ ९ ॥
एलादि ।
एलोपकुल्यामधुकाश्मभेदकौन्तीश्वदंष्ट्रावृषकोरुबूकैः ।
शृतं पिबेदश्मजतु प्रगाढं सशर्करे चाश्मरिमूत्रकृच्छ्रे॥१०॥