भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८५२ भैषज्यरत्नावली । [ अश्मरी-
प्यास, वमन, मनोव्याधि, कम्प, रुधिरकी वमन, रक्तस्राव, राजयक्ष्मा, मृगी, उन्माद, शिरोरोग, योनिदोष, रजोदोष, वीर्यदोष और स्वरभङ्गप्रभृति रोगोंमें शीघ्र उपकार करता है। स्मरणशक्ति और वीर्यको बढाता है तथा अत्यन्त वाजीकरण, पुत्रदायक, बल-वर्णवर्द्धक एवं विशेषकर वायुके विकारोंको नष्ट करनेवाला है। इस घृतको पान, भोजन और नस्यमें व्यवहार करना चाहिये। यह अत्युत्तम रसायन विदारीघृतनामसे प्रसिद्ध है ॥ ५७-६१ ॥
वरुणाद्य तैल ।
त्वक्पत्रपुष्पमूलस्य वरुणात्सत्रिकण्टकात् ।
कषायेण पचेत्तैलं वस्तिनाऽऽस्थापनेन च ॥
शर्कराश्मरिशूलघ्नं मूत्रकृच्छ्रविनाशनम् ॥ ६२ ॥
छाल, पत्ते, फूल और जडसहित वरना और गोखुरूके बीज इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनालेवे । फिर इस क्वाथके साथ तिलके तेलको सिद्ध करके आस्थापनवस्ति देवे तो शर्करा, पथरी, शूल और मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होते हैं ६२ ॥
शिलोद्भिदादितैल ।
शिलोद्भिदैरण्डसमास्थिराभिः पुनर्नवाभीरुरसेषु सिद्धम् ।
तैलं घृतं क्षीरमथानुपानं कालेषु कृच्छ्रादिषु संप्रयोज्यम् ॥ ६३ ॥
पुनर्नवा और शतावरके रसमें पाषाणभेद, अण्डकी जड और शालपर्णी इनका समान भाग मिश्रित चूर्ण डालकर तिलके तेल अथवा घृतको पकावे । इस तेलको दूधके साथ मिलाकर बहुत पुराने मूत्रकृच्छ्ररोगमें पान करना चाहिये । इससे उक्त रोग जल्द आराम होता है ॥ ६३ ॥
उशीराद्य तैल ।
उशीरं तगरं कुष्ठं यष्टीमधुकचन्दनम् ।
विभीतकाभयाभीरु पद्ममुत्पलशारिवे ॥ ६४ ॥
बला तुरंगगन्धा च दशमूलं शतावरि ।
विदारी चैव काकोली गुडूच्यतिबला तथा ॥ ६५ ॥
श्वदंष्ट्रा शपुष्पा च वट्यालकमधूरिके ।
एतैः कर्षमितैर्भागैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ६६ ॥
सपत्रफलमूलस्य गोक्षुरस्य पलं शतम् ।
जलद्रोणे विपक्तव्यं पादांशेनावतारयेत् ॥ ६७ ॥