भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 886

८९४ भैषज्यरत्नावली । [ प्रमेह-

अश्मरीरोगमें अपथ्य ।

मूत्रस्य शुक्रस्य च वेगमम्लं विष्टम्भि रूक्षं गुरु चान्नपानम् ।
विरुद्धपानाशनमश्मरीमान् विवर्जयेत्सन्ततमप्रमत्तः ॥ ७२ ॥

मूत्र और शुक्रके अवरोध, खट्टे रस, विष्टम्भकारक, रूखे और पचनेमें भारी ऐसे अन्न तथा पान एवं प्रकृतिविरुद्ध अन्नपान करना पथरीवाले रोगीको तत्काल छोड़-देने चाहिये । क्योंकि ये सब इस रोगमें अपथ्य हैं ॥ ७२ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम अश्मरीचिकित्सा ॥


प्रमेहकी चिकित्सा ।

स्थूलः प्रमेही बलवानिहैकः कृशस्तथाऽन्यः परिदुर्बलश्च ।
संबृंहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषबलाधिकस्य ॥ १ ॥

प्रमेहरोगी दो प्रकारके होते हैं, जैसे—कोई स्थूल और बलवान्, कोई कृश तथा दुर्बल । इनमें कृश पुरुषोंको बृंहण (मांस और बलवर्द्धक) औषधियोंसे एवं बलवान् पुरुषोंको दोषोंकी अधिकता होनेपर वमन, विरेचनादिसे शुद्ध करे १

ऊर्ध्वं तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ।
संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया संशमनी विधेया ॥ २

प्रमेहरोगमें वमन और विरेचनादिद्वारा सम्पूर्ण दोष ऊपर तथा नीचे मार्गसे निकल जायें तब सन्तर्पण क्रिया करे । किन्तु जो प्रमेहरोगी संशोधन करने योग्य नहीं हों उनकी रोगको नष्ट करनेवाली औषधियोंसे चिकित्सा करे ॥ २ ॥

ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषां रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ।
मन्दाः कषाया रसचूर्णलेहा मसूरमुद्गा लघवश्च भक्ष्याः ॥ ३ ॥

प्रमेहरोगीको विष्किर (मुरगा, कबूतर, हंस, मोर, तीतर) और प्रतुद (गिद्ध, बाज, काकादि) पक्षियोंका मांस एवं बकरी आदि जंगली पशुओंका मांसरस तथा कषैले रसवाले पदार्थ व अल्प परिमाण क्वाथ, रस, चूर्ण, अवलेह, मसूर और मूँग आदि हल्के पदार्थ भोजन करने चाहिये ॥ ३ ॥

श्यामाककोद्रवोद्दालगोधूमचणकाढकी ।
कुलत्थाऽत्र हिता भोज्या पुराणा मेहिनां सदा ॥
जाङ्गलं तिक्तशाकं च यवान्नं चंक्रमो मधु ॥ ४ ॥