भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८७
पित्ताधिक्यसन्निपातज्वरकी चिकित्सा।
परूषकादि।
परूषकाणि त्रिफला देवदारु सकट्फलम् ।
चन्दनं पद्म कं चैव तथा कटुकरोहिणी ॥ ९ ॥
पृश्निपर्णी श्रुतैस्त्वेभिरुषितं शीतलं जलम् ।
पित्तोत्तरे नृणामेतत् सन्निपाते चिकित्सितम् ॥ १० ॥
फालसे, हरड, बहेडा, आमला, देवदारु, कायफल, लालचन्दन, पद्माख, कुटकी और पृश्निपर्णी इनको समानभाग लेकर रात्रिमें शीतल जलमें भिजोदेवे, फिर प्रातःकाल क्वाथ बनाकर शीतल करके सेवन करावे, पित्ताधिक्य सन्निपातज्वरमें यह अत्युत्तम औषध है ॥ ९ ॥ १० ॥
चन्दनादिक्वाथ।
चन्दनं पद्म कं चैव तथा कटुकरोहिणी ।
पृथक्पर्णी समं सिद्धमुषितं शीतलं जलम् ।
पित्तोत्तरे नृणामेतत् सन्निपाते चिकित्सितम् ॥ ११ ॥
लालचन्दन, पद्माख, कुटकी और पिठवन इन सबको समानभाग लेकर सायंकालके समय जलमें भिजोकर रख देवे. फिर प्रातःकाल क्वाथ बनाकर शीतल करके सेवन करे. यह भी पित्ताधिक्य सन्निपातज्वरमें उपयोगी है ॥ ११ ॥
किरातादि सप्तक।
किराततिक्तकं मुस्तं गुडूची विश्वभेषजम् ।
पाथोदीच्यं मृणालं च शृतं पित्ताधिके पिबेत् ॥ १२ ॥
पित्तप्रधान सन्निपातज्वरमें चिरायता, नागरमोथा, गिलोय, सोंठ, पाठ, सुगन्धवाला और खस इनका क्वाथ बनाकर पान करना चाहिये ॥ १२ ॥
श्लेष्मोष्णसन्निपातज्वरकी चिकित्सा।
बृहत्यादिक्वाथ।
बृहत्यौ पौष्करं भार्गी शठी शृङ्गी दुरालभा ।
वत्सकस्य च बीजानि पटोलं कटुरोहिणी ॥ १३ ॥
बृहत्यादिगणः शस्तः सन्निपाते कफोत्तरे ।
श्वासादिषु च सर्वेषु हितः सोपद्रवेऽपि च ॥ १४ ॥