भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६५
त्रिवृद्दन्ती पत्रकं च त्वगेला वंशलोचना ।
प्रत्येकं कर्षमानानि कुर्यादेतानि बुद्धिमान् ॥ ६० ॥
धान्यकं त्रिफला चव्यं विडङ्गं गजपिप्पली ।
सुवर्णमाक्षिकं व्योषं द्वौ क्षारौ लवणत्रयम् ॥ ६१ ॥
एतानि टंकमानानि संगृह्णीयात्पृथक् पृथक् ।
द्विकर्षं हतलौहं स्याच्चतुष्कर्षा सिता भवेत्॥ ६२ ॥
शिलाजत्वष्टकर्षं स्यादष्टौ कर्षाश्च गुग्गुलोः ।
विधिना योजितैरेतैः कर्त्तव्या वटिका शुभा ॥ ६३ ॥
बावची, वच, नागरमोथा, चिरायता, देवदारु, हल्दी, अतीस, दारुहल्दी, पीपलामूल, चीता, निसोत, दन्ती, तेजपात, दारचीनी. इलायची और वंशलोचन ये प्रत्येक दो दो तोले एवं धनियां, त्रिफला, जब्य, वायविडङ्ग, गजपीपल, शुद्ध स्वर्णमाक्षिक, त्रिकुटा, सज्जी, जवाखार, सैंधानमक, विरियासञ्चरनमक और विडनमक ये प्रत्येक चार २ मासे, लोहभस्म चार तोले, मिश्री ८ तोले, शिलाजीत १६ तोले और गूगल १६ तोले लेवे । इन सबको एकत्र कूट पीसकर अच्छे प्रकार खरल करके गोलियाँ बनालेवे ॥ ५९-६३ ॥
चन्द्रप्रभेति विख्याता सर्वरोगप्रणाशिनी ।
निहन्ति विंशतिं मेहान् कृच्छ्रमष्टविधं तथा ॥ ६४ ॥
चतस्रश्चाश्मरीस्तद्वन्मूत्राघातांस्त्रयोदश ।
अण्डवृद्धिं पाण्डुरोगं कामलां च हलीमकम् ॥ ६५ ॥
कासं श्वासं तथा कुष्ठमग्निमान्द्यमरोचकम् ।
वातपित्तकफव्याधीन् बल्या वृष्या रसायनी ॥ ६६ ॥
समाराध्य शिवं तस्मात्प्रयत्नाद्वटिकामिमाम् ।
प्राप्तवांश्चन्द्रमा यस्मात्तस्माच्चन्द्रप्रभा स्मृता ॥ ६७ ॥
चन्द्रप्रभानामसे प्रसिद्ध यह वटी सम्पूर्ण रोगोंको नाश करनेवाली है । एवं बीसों-प्रकारके प्रमेह, आठप्रकारके मूत्रकृच्छ्र, चार प्रकारकी पथरी, तेरह प्रकारके मूत्राघात, अण्डकोषवृद्धि, पाण्डुरोग, कामला, हलीमक, खाँसी, इवास, कोढ, मन्दाग्नि, अरुचि और वातज, पित्तज तथा कफजनित रोगोंको तत्काल नष्ट कर देती है । इसी प्रकार बलकारक, वीर्यवर्द्धक और अत्युत्तम रसायन है । इस वटीको शिवजीमहाराजकी आराधना करके चन्द्रमाने प्राप्त किया था इसकारण इसकी चन्द्रप्रभा नामसे प्रसिद्धि हुई ॥ ६४-६७ ॥
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