भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८९७
सोमरोगं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा । विडङ्गाद्यमिदं लौहं सर्वरोगनिषूदनम् ॥ २२ ॥ इससे सर्वप्रकारके मेदरोग दूर होते हैं । यह विडंगाद्यलोह बल अवस्था और कान्तिको बढानेवाला अग्निको दीपन करनेवाला एवं अत्युत्तम वाजीकरण है । यह सोमरोग और अन्यान्य सर्वप्रकारके विकारोंको इस प्रकार नष्ट करदेता है, जिस प्रकार सूर्य अन्धकारके पुञ्जको छिन्नभिन्न करदेता है ॥ २१ ॥ २२ ॥
त्र्यूषणादिलौह ।
त्र्यूषणं विजया चव्यं चित्रकं विडमौद्भिदम् । वागुजी सैन्धवं चैव सौवर्चलसमन्वितम् ॥ २३ ॥ अयश्चूर्णेन संयुक्तं भक्षयेन्मधुसर्पिषा । स्थौल्यापकर्षणं श्रेष्ठं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥ २४ ॥ मेहघ्नं कुष्ठशमनं सर्वव्याधिहरं परम् । नाहारे यन्त्रणा कार्या न विहारे तथैव च ॥ त्र्यूषणाद्यमिदं लौहं रसायनवरोत्तमम् ॥ २५ ॥
सोंठ, पीपल, मिरच, भाँग, चव्य, चीता, विरियासञ्चर नोन, साँभरनोन, बावची, सैंधानमक और कालानमक इन सबोंका चूर्ण समान भाग एवं समस्त चूर्णकी बराबर लोहभस्म मिलाकर एकत्र पीसलेवे । फिर इसको तीन रत्ती प्रमाण लेके शहद और घीमें मिलाकर भक्षण करे तो स्थूलताका ह्रास होता है तथा बल वर्ण और जठराग्निकी वृद्धि होती है । प्रमेह, कुष्ठ एवं अन्यान्य अनेक प्रकारके विकार दूर होते हैं । इसके सेवन करनेपर आहार विहारका कुछ परहेज नहीं करे । यह त्र्यूषणाद्यलोह सर्वोत्तम रसायन है ॥ २३-२५ ॥
लौहरसायन ।
गुग्गुलुस्तालमूली च त्रिफला खदिरं वृषम् । त्रिवृताऽलम्बुषा स्नुक् च निर्गुण्डी चित्रकं शठी ॥ २६ ॥ एषां दशपलान् भागांस्तोये पञ्चाढके पचेत् । पादशेषं ततः कृत्वा कषायमवतारयेत् ॥ २७ ॥ पलद्वादशकं देयं तीक्ष्णलौहस्य चूर्णितम् । पुराणसर्पिषः प्रस्थं शर्कराष्टपलानि च ॥ २८ ॥
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