भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा भाषाटीकासहिता । ८९९

यह लोहरसायन वात कफनाशक, कुष्ठ, प्रमेह और ज्वरको नाश करनेके लिये अत्युत्तम है । एवं कामला, पाण्डु, सूजन, भगन्दर, मूर्च्छा, मोह, विष, उन्माद और नाना प्रकारके विषदोषोंको हरता है । स्थूलपुरुषोंकी स्थूलताको कृश करनेवाली, मेदरोगकी परमोत्कृष्ट औषधि एवं उदरको अत्यन्त पतला करनेवाली है । अत्यन्त 'बलकारक, रसायन, मेधाजनक उत्तम वाजीकरण, लक्ष्मीजनक, पुत्रको उत्पन्न करनेवाली, वली ( शरीरमें झुर्रियोंका पडना ) और पलित ( असमय बालोंका सफेद होना ) इत्यादि रोगोंको नाश करती है । इस औषधिके सेवन करनेपर केला, कन्द ( आलू, काँडू आदि ), काँजी, करौंदा, करीर ( बाँसके अंकुर ) और करेला इन छः ककारवाले पदार्थोंको त्याग देवे ॥ ३३-३६ः ॥

नवकगुग्गुलु ।

व्योषाग्नित्रिफलामुस्तविडंगैर्गुग्गुलुं समम् ।
खादन्सर्वाञ्जयेद् व्याधीन् मेदःश्लेष्मामवातजान् ॥३७॥

सोंठ, मिरच, पीपल, चीता, हरड, बहेडा, आमला, नागरमोथा और वायविडङ्ग ये सब समान भाग और इन सबकी बराबर शुद्ध गूगल लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको सेवन करनेसे मेदरोग, कफ और आमवातजन्य सर्वप्रकारके रोग दूर होते हैं ॥ ३७ ॥

अमृताद्यगुग्गुलु ।

अमृतातृटिवेल्लवत्सकं कलिंगपथ्याममलकानि गुग्गुलुः ।
क्रमवृद्धमिदं मधुप्लुतं पिडिकास्थौल्यभगन्दरं जयेत् ॥३८॥

गिलोय १ तोला, छोटी इलायची २ तोले, वायविडङ्ग ३ तोले, कुडेकी छाल ४ तोले, इन्द्रजौ ५ तोले, हरड ६ तोले, आमले ७ तोले और शुद्ध गूगल ८ तोले इन सबको कूट पीसकर शहदमें मिलाकर चाटनेसे पिडिका, स्थूलता और भगन्दररोग नष्ट होते हैं ॥ ३८ ॥

त्रिफलाद्यतैल ।

त्रिफलातिविषामूर्वात्रिवृच्चित्रकत्रासकैः ।
निम्बारग्वधषड्ग्रन्थासप्तपर्णनिशाद्वयैः ॥ ३९ ॥
गूडूचीन्द्रसुरीकृष्णाकुष्ठसर्षपनागरैः ।
तैलमेभिः शनैः पक्वं सुरसादिरसाप्लुतम् ॥ ४० ॥