भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 934
९०२भैषज्यरत्नावली ।[ उदररोग-

रक्तशालीन्यवान्मुद्गान् जाङ्गलांश्च मृगद्विजान् ।
पयोमूत्रासवारिष्टमधु सीधु च शीलयेत् ॥ ३ ॥
लालशालिके चावल, जौ, मूँग आदि अन्न, मृग और जंगली पशुपक्षियोंके मांस-रस, दूध, गोमूत्र, आसव, अरिष्ट, मधु और सीधुनामक मद्यप्रभृति पदार्थ उदर-रोगीको भोजन करने चाहिये ॥ ३ ॥

दोषातिमात्रोपचयात् स्रोतोमार्गनिरोधनात् ।
सम्भवत्युदरं तस्मान्नित्यमेनं विरेचयेत् ॥
पाययेत्तैलमेरण्डं समूत्रं सपयोऽपि वा ॥ ४ ॥
वातादिदोषोंके अधिक सञ्चय होनेसे रक्तको बहानेवाले स्रोत बन्द होजाते हैं । इस कारण उदररोग उत्पन्न होते हैं । अतः रोगीको नित्यप्रति गोमूत्र अथवा दूध मिला हुआ अण्डीका तेल उचित मात्रास पान कराकर दस्त करावे ॥ ४ ॥

वातोदरं बलवतः स्नेहस्वेदैरुपाचरेत् ।
स्निग्धाय स्वेदिताङ्गाय दद्यात्स्निग्धं विरेचनम् ॥ ५ ॥
हृते दोषे परिम्लानं वेष्टयेद्वाससोदरम् ।
यथाऽस्यानवकाशत्वाद्वायुर्नाध्मापयेत्पुनः ॥ ६ ॥
वातजनित उदररोगमें यदि रोगी बलवान् हो तो प्रथम उसको स्नेह (घृतादि) द्रव्य पान कराकर स्निग्ध करे । पश्चात् स्वेदक्रिया करके स्निग्ध (अण्डीका तेल आदि) विरेचन देवे । इस प्रकार करनेसे दोषोंके नष्ट होजानेपर जब पेट मुरझाजाय तब उसको वस्त्रसे लपेट देवे । अच्छे प्रकार बाँधनेसे उदर वायुद्वारा फिर नहीं फूल सकता ॥ ५ ॥ ६ ॥

विरिक्ते च यथादोषहरैः पेया शृता हिता ॥
विरेचन देनेके पश्चात् रोगीको वातादिदोषनाशक द्रव्योंके द्वारा पेया बनाकर देनेसे विशेष हित होता है ॥

वातोदरी पिबेत्तक्रं पिप्पलीलवणान्वितम् ।
शर्करामरिचोपेतं स्वादु पित्तोदरी पिबेत् ॥ ७ ॥
यमानीसैन्धवाजाजीव्योषयुक्तं कफोदरी ।
त्र्यूषणक्षारलवणैर्युक्तं तु निचयोदरी ॥ ८ ॥
वातजन्य उदररोगमें पीपल और सेंधानमकका चूर्ण मिलाकर तक्र पान करे । मिश्री और कालीमिरचके चूर्णसे युक्त मधुर तक्रको पित्तोदररोगी पीवे ।