भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९०९
शोथोदरारिलौहं ।
पुनर्नवामृतावह्रिगवाक्षीमानशिग्रवः ।
सूर्यावर्त्तार्कमूलं च पृथगष्टपलं जले ॥ ४५ ॥
पादशेषे शृतं द्रोणे सुपूते वस्त्रगालिते ।
लौहचूर्णाष्टपलकं पचेदाज्यसमं भिषक् ॥ ४६ ॥
अर्कस्य द्विपलं क्षीरं स्नुहीक्षीरं चतुःपलम् ।
पलद्वयं कौशिकस्य गन्धकस्य पलं तथा ॥ ४७ ॥
पलाईं पारदं सिद्धे वक्ष्यमाणं तु निक्षिपेत् ॥ ४८ ॥
पुनर्नवा, गिलोय, चीता, इन्द्रायण, मानकन्द, सहिं जना, हुलहुलकी जड और आककी जड इन औषधियोंको अलग २ आठ आठ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें लोहेकी भस्म ८ पल, गौका घी ८ पल, आकका दूध २ पल, थूहरका दूध ४ पल, शुद्ध गूगल ८ तोले, शुद्ध गन्धक ४ तोले और यथाविधि शोधित पारा २ तोले डालकर ताँबेके पात्रमें उत्तम रूपसे पाक कर । जब पाक भलीभाँति पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर शीतल होजानेपर उसमें निम्नोक्त औषधियोंके चूर्णको डालदेवे ॥ ४५-४८ ॥
जयपालं ताम्रमभ्रं शुद्धमत्र प्रदापयेत् ।
कंकुष्ठवह्निकन्दानां शराख्याद् घण्टकर्णकात् ॥
पलाशस्य च बीजानि कञ्चुकी तालमूलिका ॥ ४९ ॥
त्रिफलायाः कृमिरिपोस्त्रिवृद्दन्तीभवं तथा ।
सूर्यावर्त्तगवाक्ष्योश्च वर्षाभूर्वज्रवल्लिका ॥ ५० ॥
एषां लौहसमां मात्रां स्निग्धे भाण्डे निधापयेत् ।
अतोऽस्य भक्षयेन्मात्रामनुपानं च युक्तितः ॥ ५१ ॥
यथा-जमालगोटा, शुद्ध ताँबे और अभ्रककी भस्म, सुरदाशंख, चीतेकी जड, जिमीकन्द, शरपता, मोखावृक्ष, ढाकके बीज, क्षीरकंचुकी, मुसली, त्रिफला, वाय-विडङ्ग, निसोंत, दन्तीकी जड, हुलहुल, इन्द्रायणकी जड, पुनर्नवा और हडसंकरी ये प्रत्येक औषधि लोहेकी समान भाग लेकर बारीक कूट पीसकर अच्छेप्रकार मिलादेवे । फिर उत्तम घृतसे चिकने पात्रमें भरकर रखदेवे । पश्चात् प्रतिदिन प्रातःकाल उपयुक्त मात्रासे सेवन करे और देश, काल तथा दोषोंके बलाबलको विचारकर अनुपानकी कल्पना करे ॥ ४९-५१ ॥