भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 984
९६२भैषज्यरत्नावली ।[ शोथ-

अमृतं धूर्त्तबीजं च हिङ्गुलं च समं समम् ।
धूर्त्तपत्ररसेनैव मर्दयेद्याममात्रकम् ॥ ५० ॥
मुद्गोपमां वटीं कृत्वा दुग्धेन सह पाययेत् ।
दुग्धेन भोजयेदन्नं वर्जयेल्लवणं जलम् ॥ ५१ ॥
शोथं नानाविधं हन्ति पाण्डुरोगं सकामलम् ।
सेयं दुग्धवटी नाम्ना गोपनीया प्रयत्नतः ॥ ५२ ॥

२–शुद्ध मीठा तेलिया, धतूरेके बीज और हिंगुलोत्पन्न पारा इनको समानांश लेकर धतूरेके पत्तोंके रसमें एक पहरतक अच्छेप्रकार खरल करे । फिर मूंगकी बराबर गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक वटी दूधके साथ पान करे । इसपर केवल दूधके साथ अन्न भक्षण करे । नमक, जल और अन्य सर्वप्रकारके अहितकर पदार्थ त्यागदेवे । इससे विविध भाँतिके शोथ, पाण्डु और कामलारोग नाश होते हैं । यह दुग्धवटी सप्रयत्न गुप्त रखने योग्य है ॥ ५०–५२ ॥

गृहीत्वा दरदात्कर्षं तदर्द्धं देवपुष्पकम् ।
फणिफेनं विषं जातीफलं धुस्तूरबीजकम् ॥ ५३ ॥
संमर्द्य विजयाद्रावैर्मुद्गमात्रां वटीं चरेत् ।
अनुपानं प्रदातव्यं शोथे क्षीरं भिषग्वरैः ॥ ५४ ॥
ग्रहण्यां विजयाक्वाथं पथ्यं दुग्धान्नमेव हि ।
जलं च लवणं चापि वर्जनीयं विशेषतः ॥ ५५ ॥
प्रबलायामुदन्यायां सलिलं नारिकेलजम् ।
पातव्यं वटिका चैषा शोथं हन्ति न संशयः ॥
ग्रहणीमतिसारं च ज्वरं जीर्णं निहन्ति च ॥ ५६ ॥

३–सिंगरफ दो तोले, लौंग, अफीम, शुद्ध मीठा तेलिया, जायफल और धतूरेके बीज ये प्रत्येक एकएक तोला लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर भाँगके रसमें उत्तम विधिसे खरल करे, फिर मूँगसरीखी गोलियाँ बनालेवे । सुवैद्य इस वटीको शोथरोग में दूधके साथ और संग्रहणीमें भाँगके क्वाथके साथ देवे । दूध, भात भोजन करना इसपर पथ्य है । जल और लवण सेवन करना बिल्कुल छोडदेवे । अधिक प्यास लगनेपर नारियलका जल पान करावे । यह वटी सूजन, संग्रहणी, अतीसार और जीर्णज्वरको निस्सन्देह नष्ट करती है ॥ ५३–५६ ॥