भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 992

९६० | भैषज्यरत्नावली | [ शोथ-

शुण्ठीघृत ।

विश्वौषधस्य कल्केन दशमूलजले शृतम् ।
घृतं निहन्याच्छ्वयथुं ग्रहणीं पाण्डुतामयम् ॥ १०२ ॥
सोंठके कल्कद्वारा दशमूलके क्वाथमें घीको सिद्ध कर सेवन करनेसे सूजने, संग्रहणी और पाण्डुरोग दूर होते हैं ॥ १०२ ॥

स्वल्प-पुनर्नवाद्यघृत ।

पुनर्नवाक्वाथकल्कसिद्धं शोथहरं घृतम् ॥
पुनर्नवेके क्वाथ और कल्कद्वारा सिद्ध किया हुआ घृत शोथको हरता है ॥

पुनर्नवाद्यघृत १-२ ।

पुनर्नवातुलां गृह्य जलद्रोणे विपाचयेत् ।
चतुर्भागावशेषेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १०३ ॥
भूनिम्बविजयाशुण्ठीशोथघ्नामरदारुभिः ।
कासं श्वासं ज्वरं हन्ति शोथं चापि सुदारुणम् ॥ १०४ ॥
१–सौ पल विषखपरेको लेकर ३२ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल बाकी रहजाय तब उतारकर छानले । फिर उसमें १ प्रस्थ घृत एवं चिरायता, भाँग, सोंठ, पुनर्नवा और देवदारु इनके समान भागसे मिलेहुए आधसेर चूर्णको डालकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इस घृतका सेवन करनेसे खाँसी, श्वास, ज्वर और दारुण शोथ नष्ट होता है ॥ १०३ ॥ १०४ ॥

पुनर्नवाचित्रकदेवदारुपञ्चोषणक्षारहरीतकीनाम् ।
कल्केन पक्वं दशमूलतोये घृतोत्तमं शोथनिषूदनं च ॥ ५॥
२–पुनर्नवा, चीतेकी जड, देवदारु, पञ्चोषण (पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता और सोंठ), जवाखार, हरड इनके कल्कको समान भाग डालकर दशमूलके काढ़ेमें गौके उत्तम घृतको पकावे । यह घृत शोथका नाश करनेवाला है ॥ ५ ॥

माणकघृत ।

माणकक्वाथकल्काभ्यां घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
एकजं द्वन्द्वजं शोथं त्रिदोषजमपोहति ॥ ६ ॥
माणककन्दके क्वाथ और कल्कके द्वारा १ प्रस्थ घृतको उत्तम रीतिसे पकावे । यह घृत एकदोषज, द्विदोषज और सन्निपातिक शोथको शीघ्र दूर करता है ॥ ६ ॥