भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९६५

सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा आमला, काकडासिंगी, धनियां, कायफल, कचूर, दारुहल्दी, फूलप्रियंगु, पद्माख, मढर, कूठ, पुनर्नवा; अजवायन, कालाजीरा, इलायची, दारचीनी, लोध, तेजपात, नागकेशर, वच, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड, सोया, सुगन्धवाला, मंजीठ रास्ना और जवासा इनको अलग अलग दो दौ तोले लेकर एकत्र चूर्ण करके डालदेवे फिर मन्द मन्द अग्निद्वारा अच्छेप्रकार तेलकों सिद्ध कर उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ३१-३४ ॥

कामलां पाण्डुरोगं च हलीमकमतारुचिम् ।
रक्तपित्तं महाघोरं कासं श्वासं भगन्दरम् ॥ ३५ ॥
प्लीहानमुदरं चैव जीर्णज्वरमपोहति ॥
तैलं पुनर्नवाख्यातं सर्वान्व्याधीन्न्यपोहति ॥ ३६ ॥

यह तेल कामला, पाण्डु, हलीमक, अरुचि, रक्तपित्त, अत्यन्त घोर श्वास खाँसीं भगन्दर, प्लीहा, उदररोग, पुराना ज्वर एवं अन्य विविधभाँतिके समस्त विकारोंकों बहुत शीघ्र दूर करता है ॥ १३५ ॥ ३६ ॥

शैलेयाद्यतैल ।

शैलेयकुष्ठागुरुदारुकौन्तीत्वकपद्मकैलाम्बुपलाशमुस्तैः ।
प्रियङ्गुस्थौणेयकहेममांसीतालीशपत्रप्लवपत्रधान्यैः ॥ ३७ ॥
श्रीवेष्टकध्यामकपिप्पलीभिः पृक्कानखैर्वापि यथोपलाभम् ।
वातान्वितेऽभ्यङ्गमुरशंति तैलं सिद्धं सुपिष्टैरपि च प्रदेहः ३८

भूरिछरीला, कूठ अगर, देवदारु, रेणुका, दारचीनी, पद्माख, इलायची, सुगन्ध-बाला, कचूर, नागरमोथा, फूलप्रियंगु, गठिवन, नागकेशर, बालछड, तालीशपत्र, केवटी मोथा, तेजपात, धनियां, धूपसरल, रोहिषतृण, पीपल, असवरग और नखी-सुगन्धद्रव्य इन औषधियोंमेंसे जितनी प्राप्त हो सकें उन औषधोंके कल्कद्वारा यथा-विधि तिलके तेलको सिद्ध करे । इस तेलको मर्दन करनेसे वा इन्हीं औषधियोंकों तेलमें पीसकर शरीरपर लेप करनेसे वातजन्य सूजन नष्ट होय ॥ ३७ ॥ ३८ ॥

समुद्रशोषणतैल ॥

निर्गुण्डी दशमूली च धुस्तूरककरञ्जकौ ।
शुष्कमूलजयाविश्वरास्नादारुपुनर्नवाः ॥ ३९ ॥
एषां च प्रकृते क्वाथे क्वाथे शास्तोतजे तथा ।
कटुतैलं पचेत्प्रस्थं सैन्धवं कल्कपादिकम् ॥ १४० ॥