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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ
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चिकित्सा ] भाषार्टीकासहिता । ७१७


ही नाश करता है। इसको नित्यप्रति नियमानुसार सेवन करनेसे बल, वर्ण और आयुकी वृद्धि होती है । इस परमोत्तम घृतको अश्विनीकुमारोंने निर्माण किया है ॥ ६६–६९ ॥

मध्यमगुडूचीतैल ।

गुडूचीक्वाथकल्काभ्यां सिद्धं तैलं पयः समम् ।
वातरक्तं निहन्त्याशु साध्यासाध्यमथापि वा ॥७०॥
एकजं द्वन्द्वजं चैव तथैव सान्निपातिकम् ।
नाशयेत्तिमिरं घोरं गुडूचीतैलमुत्तमम् ॥ ७१ ॥

गिलोयके क्वाथ और कल्कके साथ दूध और तिलको समान भाग मिलाकर तैलको सिद्ध करे । यह तैल साध्य अथवा असाध्य वातरक्त तथा एकदोषज, द्विदोषज और त्रिदोषज घोर तिमिररोगको तत्काल नष्ट करता है ॥

बृहद्गुडूचीतैल ।

शतं छिन्नरुहायाश्च जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तेन पादावशेषेण तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७२ ॥
क्षीरं चतुर्गुणं दद्यात्कल्कानेतान् प्रयत्नतः ।
अश्वगन्धा विदारी च काकोल्यौ हरिचन्दनम् ॥७३॥
शतावरी चातिबला श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ।
कृमिघ्नं त्रिफला रास्ना त्रायमाणा च शारिवा ॥७४॥
जीवन्ती ग्रन्थिकं व्योषं वागुची भेकपर्णिका ।
विशाला ग्रन्थिपर्णं च मञ्जिष्ठा चन्दनं निशा ॥ ७५ ॥
शताह्वा सप्तपर्णी च कार्षिकाण्युपकल्पयेत् ।
पानाभ्यञ्जननस्येषु वातरक्ते प्रयोजयेत् ॥ ७६ ॥

सौ पल गिलोयको ३२ सेर जलमें पकावे, पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर क्वाथके साथ तिलका तैल १ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ, कल्कके लिये असगन्ध, विदारीकन्द, काकोली, क्षीरकाकोली, श्वेतचन्दन, शतावर, कंघी, गोखरू, बडी कटेरी, कटेरी, वायविडंग, त्रिफला, रायसन, त्रायमाणा, अनन्तमूल, जीवन्ती, पीपलामूल, त्रिकुटा, वापची, मंडूकपर्णी, इन्द्रायन, गठिवन, मञ्जीठ, लालचन्दन, हल्दी, सौंफ और लज्जावन्ती, इन प्रत्येकके एक-एक कर्ष परिमाण कल्कको मिलाकर यथाविधि तेलको पकावे । इस बृहद्गुडूची-