भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७५९
एवं अण्डकी जड और जौके क्वाथमें हींग और कालानमक डालकर पान करने से शूलरोग दूर होता है ॥ १० ॥
सौवर्चलाम्लिकाजाजीमरिचैर्द्विगुणोत्तरैः । मातुलुङ्गरसैः पिष्ट्वा गुटिका वातशूलनुत् ॥ ११ ॥
कालानमक १ तोला, इमली २ तोले, कालाजीरा ४ तोले और कालीमिरच ८ तोले इनके चूर्णको एकत्र बिजौरानींबूके रसमें खरल करके ३-३ मासेकी गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ प्रतिदिन प्रातःकाल उष्ण जलके साथ खानेसे वातशूलको नष्ट करती हैं ॥ ११ ॥
बीजपूरकमूलं च घृतेन सह पाययेत् । जयेद्वातभवं शूलं कर्षमेकप्रमाणतः ॥ १२ ॥
बिजौरेनीम्बूकी जडको पीसकर दो तोले परिमाण लेकर घृतके साथ पान कराने से वातजन्य शूल दूर होता है ॥ १२ ॥
हिंग्वम्लवेतसव्योषयमानीलवणत्रिकैः । बीजपूररसोपेतैर्गुटिका वातशूलनुत् ॥ १३ ॥
हींग, अम्लवेत, सोंठ, पीपल, मिरच, अजवायन, सेंधानमक, कालानमक और विडनमक इनको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे । फिर सबको एकत्र करके बिजौरेनीम्बूके रसमें खरल करके तीन तीन मासेकी गोलियाँ उष्ण जलके साथ सेवन करनेसे वातज शूलको नष्ट करती हैं ॥ १३ ॥
बिल्वमूलतिलैरण्डं पिष्ट्वा चाम्लतुषाम्भसा । गुडिकां भ्रामयेदुष्णां वातशूलविनाशिनीम् ॥ १४ ॥
बेलकी जड, तिल और अण्डकी जड इनको एकत्र काँजीके साथ खरल करके गोली बनालेवे । इस गोलीको गरम करके पीडास्थानपर लेप (भ्रमण) करनेसे वातज शूल नष्ट होता है ॥ १४ ॥
तिलैश्च गुडिकां कृत्वा भ्रामयेज्जठरोपरि । गुडिका शमयत्येषा शूलं चैवातिदुस्तरम् ॥ १५ ॥
तिलोंको खट्टी काँजीमें पीसकर गोली बनावे । फिर उसको गरम करके पेटके ऊपर लेप करे । यह गोली दारुण वातशूलको भी दूर करदेती है ॥ १५ ॥
नाभिलेपाज्जयेच्छूलं सद्यः काञ्जिकान्वितः । जीवन्तीमूलकल्क वा सतैलः पार्श्वशूलनुत् ॥ १६ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७५७
बदरास्थिप्रमाणेन गुटिकां कारयेद्भिषक् ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय तोयमुष्णं पिबेदनु ॥ ६१ ॥
शूलं च सर्वगुल्मं च अजीर्णं परिणामजम् ।
अन्त्रशूलं पङ्क्तिशूलं हृच्छूलं च विशेषतः ॥ ६२ ॥
कुक्षिशूलं पार्श्वशूलं पृथग्वातादिसम्भवम् ।
आमशूलमुदावर्त्तं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ६३ ॥
इमलीका क्षार ५ पल, पाँचों नमक प्रत्येक पांच पांच पल, जम्बीरी नींबूका रस दो प्रस्थ सबको एकत्र मर्दन करके, मन्दमन्द अग्निद्वारा पकावे । फिर शंखकी भस्म १२ पल एव हींग, सोंठ, मिरच, पीपल ये प्रत्येक चार चार तोले, शुद्ध पारा शुद्ध मीठा तेलिया और शुद्ध गन्धक ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके जम्बीरीनींबूके रसमें तीन दिनतक खरल करके बेरका गुठलीकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इस औषधको प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करके ऊपरसे गरम जल पान करनेसे सर्व प्रकारके शूल, गुल्म, अजीर्णशूल, परिणामशूल, अन्त्र-शूल, पंक्तिशूल, हृदयशूल, विशेषकर कुक्षिशूल, पार्श्वशूल एवं वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषोंसे पृथक् पृथक् उत्पन्नहुए शूल, आमशूल और उदावर्त्त ये सब रोग निस्सन्देह नाश होते हैं ॥ ५८-६३ ॥
शूलहरणयोग।
हरीतकी त्रिकटुकं कुचिला हिङ्गु सैन्धवम् ।
गन्धकं च समं सर्वं वटीं कुर्यात्सुखावहाम् ॥ ६४ ॥
लघुकोलप्रमाणां तु शस्यते प्रातरेव हि ।
एकैका वटिका ग्राह्या गुल्मशूलविनाशिनी ॥ ६५ ॥
ग्रहण्यामतिसारे च साजीर्णे मन्दपावके ।
योजयेदुष्णपयसा सुखमाप्नोति निश्चितम् ॥
सुवर्णं च भवेद्देहं सदोत्साहयुतं नृणाम् ॥ ६६ ॥
हरड, सोंठ, मिरच, पीपल, कुचला, हींग, सेंधानमक, और शुद्ध गन्धक सबको समान भाग लेकर एकत्र उत्तम प्रकारसे खरल करके छोटे बेरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली उष्ण जलके साथ सेवन करे । यह औषध गुल्म और शूलरोगनाशक है । इसको संग्रहणी, अतिसार, अजीर्ण, मन्दाग्नि आदि रोगोंमें प्रयोग करनेसे अवश्य आरोग्य लाभ होता है । इसके सेवन करनेसे
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७७६
मिश्रित करके सेवन करे। फिर क्रमसे इसकी मात्रा बढाता जाय। एवं दूध अथवा नारियलके जलका अनुपान करे। इस ओषधिके जीर्ण होजानेपर पुराने शालिधानोंके चावल, मूंग और मांसरसादि पदार्थ सेवन करने हितकारी हैं। एवं रासायनिक और अन्य सर्व प्रकारके स्वभावानुकूल पदार्थोंको सेवन करना चाहिये ॥ १०७-१०९ ॥
हृच्छूलं पार्श्वशूलं चाप्यांमवातं कटिग्रहम् ।
गुल्मशूलं नाभिशूलं यकृत्प्लीहानमेव च ॥ ११० ॥
अग्निमान्द्यं क्षयं कुष्ठं कासं श्वासं विचर्चिकाम् ।
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च योगेनानेन साधयेत् ॥ ११ ॥
इस ओषधिके सेवनसे हृदयशूल, पार्श्वशूल, आमवात, कटीग्रह, गुल्मशूल, नाभिशूल, यकृतविकार, प्लीहा, मन्दाग्नि, क्षय, कुष्ठ, खाँसी, श्वास, विचर्चिका, पथरी, मूत्रकृच्छ्र आदि समस्त रोग दूर होते हैं ॥ ११० ॥ १११ ॥
धात्रीलौह ।
धात्रीचूर्णस्याष्टौ पलानि चत्वारि लौहचूर्णस्य ।
यष्टीमधुकरजश्च द्विपलं दद्यात्खल्ले घृष्टम् ॥ १२ ॥
अमृताक्वाथैनैतच्चूर्णं भाव्यं च सप्ताहम् ।
चण्डातेपेषु शुष्कं भूयः पिष्ट्वा नवे घटे स्थाप्यम् ॥ १३॥
घृतमधुना सह युक्तं भक्तादौ मध्यतोऽन्ते च ।
त्रीनपि वारान्खादेत् पथ्यं दोषानुबन्धेन ॥ १४ ॥
भक्तस्यादौ हरते रोगान् पित्तानिलोद्भूतान् ।
मध्येऽन्नं विष्टब्ध जयति नृणां दह्यते नान्नम् ॥ १५ ॥
पानान्नकृतान् दोषान् भुक्तान्ते शीलितो जयति ।
एवं जीर्यति चान्ने शूलं नृणां सुकष्टमपि ॥ १६ ॥
हरति सहसा प्रयुक्तो योगश्चायं जरत्पित्तम् ।
चक्षुष्यं पलितघ्नं कफपित्तसमुद्भवाञ्जयेद्रोगान् ॥ १७ ॥
आमलौंका चूर्ण ८ पल, लोहचूर्ण ४ पल और मुलहठीका चूर्ण २ पल इन सबको खरलमें एकत्र कर आमलोंके क्वाथके साथ सात दिनतक ७ बार भावना