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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ
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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७७६


मिश्रित करके सेवन करे। फिर क्रमसे इसकी मात्रा बढाता जाय। एवं दूध अथवा नारियलके जलका अनुपान करे। इस ओषधिके जीर्ण होजानेपर पुराने शालिधानोंके चावल, मूंग और मांसरसादि पदार्थ सेवन करने हितकारी हैं। एवं रासायनिक और अन्य सर्व प्रकारके स्वभावानुकूल पदार्थोंको सेवन करना चाहिये ॥ १०७-१०९ ॥

हृच्छूलं पार्श्वशूलं चाप्यांमवातं कटिग्रहम् ।
गुल्मशूलं नाभिशूलं यकृत्प्लीहानमेव च ॥ ११० ॥
अग्निमान्द्यं क्षयं कुष्ठं कासं श्वासं विचर्चिकाम् ।
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च योगेनानेन साधयेत् ॥ ११ ॥

इस ओषधिके सेवनसे हृदयशूल, पार्श्वशूल, आमवात, कटीग्रह, गुल्मशूल, नाभिशूल, यकृतविकार, प्लीहा, मन्दाग्नि, क्षय, कुष्ठ, खाँसी, श्वास, विचर्चिका, पथरी, मूत्रकृच्छ्र आदि समस्त रोग दूर होते हैं ॥ ११० ॥ १११ ॥

धात्रीलौह ।

धात्रीचूर्णस्याष्टौ पलानि चत्वारि लौहचूर्णस्य ।
यष्टीमधुकरजश्च द्विपलं दद्यात्खल्ले घृष्टम् ॥ १२ ॥
अमृताक्वाथैनैतच्चूर्णं भाव्यं च सप्ताहम् ।
चण्डातेपेषु शुष्कं भूयः पिष्ट्वा नवे घटे स्थाप्यम् ॥ १३॥
घृतमधुना सह युक्तं भक्तादौ मध्यतोऽन्ते च ।
त्रीनपि वारान्खादेत् पथ्यं दोषानुबन्धेन ॥ १४ ॥
भक्तस्यादौ हरते रोगान् पित्तानिलोद्भूतान् ।
मध्येऽन्नं विष्टब्ध जयति नृणां दह्यते नान्नम् ॥ १५ ॥
पानान्नकृतान् दोषान् भुक्तान्ते शीलितो जयति ।
एवं जीर्यति चान्ने शूलं नृणां सुकष्टमपि ॥ १६ ॥
हरति सहसा प्रयुक्तो योगश्चायं जरत्पित्तम् ।
चक्षुष्यं पलितघ्नं कफपित्तसमुद्भवाञ्जयेद्रोगान् ॥ १७ ॥

आमलौंका चूर्ण ८ पल, लोहचूर्ण ४ पल और मुलहठीका चूर्ण २ पल इन सबको खरलमें एकत्र कर आमलोंके क्वाथके साथ सात दिनतक ७ बार भावना

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