भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८०५
द्वादशाहमुपेक्षेत रक्षन्नन्यानुपद्रवान् ।
परन्तु शोधनं सर्पिः शुद्धे समधुतिक्तकम् ॥ २२ ॥
जब गुल्म पकजाय और उसमेंसे राध निकलने लगे तब गुल्मस्थानको व्रणकीं समान वेधदेवे ( चीरदेवे ) फिर शोधन ( व्रणसे दूषित रक्तको निकालना ) और रोपण ( व्रणको सुखाना ) आदि क्रिया करे। यदि गुल्मस्थान स्वयं विदीर्ण होकर उसमेंसे ऊपर या नीचेसे राध निकलने लगे तो बारहदिनपर्यन्त शोधन और रोपणकर्म नहीं करे। किन्तु इसमें जो अन्य ज्वरादि उपद्रव प्राप्त होजायँ तो उनको विधिपूर्वक शान्त करे । १२ दिन बीतनेके बाद शोधक द्रव्योंकों मिलाकर घृतपान करे । जब इस घृतको पान करनेसे शरीर शुद्ध होजाय तब व्रण सुखानेके लिये शहद और तिक्तद्रव्योंको मिलाकर घृत पान करे ॥ २१ ॥ २२॥
कफगुल्मचिकित्सा ।
लङ्घनोल्लेखने स्वेदे कृतेऽग्नौ संप्रधुक्षिते ।
घृतं सक्षारकटुकं पातव्यं कफगुल्मिना ॥ २३ ॥
कफजनित गुल्मरोगमें लंघन, लेखन और स्वेदक्रियाद्वारा अग्निको दीपन करके सोंठ, मिरच, पीपल और जवाखार इनके कल्कको डालकर सिद्ध कियेहुए घृतकौ पीवे ॥ २३ ॥
मन्दोऽग्निर्वेदना मन्दा गुरुस्तिमितकोष्ठता ।
सोत्क्लेशताऽरुचिर्यस्य स गुल्मी वमनोपगः ॥ २४ ॥
जिस गुल्मरोगीके मन्दाग्नि, अल्प पीडा, पेटमें भारीपन, देहमें आर्द्रता, कोष्ठबद्धता, वमनकी इच्छा होना और अरुचि आदि उपद्रव हों तो उसको वमन करानीं चाहिये ॥ २४ ॥
मन्देऽग्नावनिले मूढे ज्ञात्वा सस्नेहमाशयम् ।
गुडिकाचूर्णनिर्यूहाः प्रयोज्याः कफगुल्मिनाम् ॥ २५ ॥
कफोत्पन्न गुल्मरोगमें अग्निकी मन्दता, वायुकी प्रबलता और आमाशयमें कफकी अधिकता होनेपर गोली, चूर्ण और क्वाथादि सेवन करने चाहिये ॥ २५ ॥
तिलैरण्डातसीबीजसर्षपैः परिलिप्य च ।
श्लेष्मगुल्ममयस्पात्रैः सुखोष्णैः स्वेदयेद्भिषक् ॥ २६ ॥
८१० भैषज्यरत्नावली । [ गुल्मरोग-
निहन्ति गुल्मं सरुजं सदाहमर्शांसि शोथांश्च तथा-
ऽऽमवातान् । सर्वोदराण्येव चिरोत्थितानि चूर्णं लवङ्गा-
दिकमाशु हन्ति ॥ ५२ ॥
लौंग, दन्ती, निसोत, अजवायन, सोंठ, वच, धनियां, चीता, त्रिफला, पीपल, कुटकी, दाख, चव्य, गोखुरू, जवाखार, छोटी इलायची, अजमोद और कुडेके बीज (इन्द्रजौ) इन सब ओषधियोंको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । प्रतिदिन इस चूर्णको दो तोले प्रमाण खाय और पीछेसे मंदोष्ण जल पीवे । इसपर हितप्रद भोजन करे । यह चूर्ण उपद्रवयुक्त और दाहसहित गुल्म, बवासीर, सूजन, आमवात एवं बहुत पुराने सर्वप्रकार उदरविकारोंको तत्काल नष्ट करता है ॥ ५०-५२ ॥
कांङ्कायनगुडिका ।
शठीं पुष्करमूलं च दन्तीं चित्रकमाढकीम् ।
शृङ्गवेरं वचां चैव पलिकानि समाहरेत् ॥ ५३ ॥
त्रिवृतायाः पलं चैकं कुर्यात्त्रीणि च हिङ्गुनः ।
यवक्षारपले द्वे तु द्वे पले चाम्लवेतसात् ॥ ५४ ॥
यमान्यजाजी मरिचं धन्याकं चेति कार्षिकम् ।
उपकुञ्च्यजमोदाभ्यां तथा चाष्टमिकामपि ॥
मातुलुङ्गरसे चैता गुडिकाः कारयेद्भिषक् ॥ ५५ ॥
कचूर, पोहकरमूल, दन्ती, चीता, अडहर, सोंठ, वच और निसोत ये प्रत्येक एक एक पल और हींग ३ पल, जवाखार २ पल, अमलवेंत २ पल तथा अजवायन, जीरा, कालीमिरच और धनियां ये प्रत्येक एक एक कर्ष, कालाजीरा और अजमोद ये प्रत्येक दो दो तोले लेवे। सबको एकत्र कूटपीसकर बिजौरेनीम्बूके रसमें यथाविधि खरल करके गोलियाँ बनालेवे ॥ ५३-५५ ॥
आसां चैकां पिबेद्द्वे वा तिस्रो वाऽनु सुखाम्बुना ।
अम्लैर्मद्यैश्च यूषैश्च घृतेन पयसाऽथवा ॥ ५६ ॥
एषा काङ्कायनेनोक्ता गुडिका गुल्मनाशिनी ।
अर्शोहृद्रोगशमनी कृमीणां च विनाशिनी ॥ ५७ ॥
गोमूत्रयुक्तं शमयेत्कफगुल्मं चिरोत्थितम् ।
क्षीरेण पित्तगुल्मं च मद्यैरम्लैश्च वातिकम् ॥ ५८ ॥