भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका [ ५ 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के गम्भीर अध्ययन से भक्तिरस की इस शाश्वत् क्रिया को समझा जा सकता है। भक्तिरस अथवा कृष्णभावना को अंगीकार करना सब उपाधियों से मुक्त ऐसा सर्वमंगलमय दिव्य जीवन प्रदान करता है जिससे मुक्ति भी तुच्छ हो जाती है। भक्तिरस स्वयं मुक्ति देने में समर्थ है, क्योंकि यह साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण को भी आकृष्ट करने वाला है। सामान्यतः कनिष्ठ भक्त भगवान् अथवा श्रीकृष्ण को देखने को उत्कंठित रहते हैं; परन्तु वास्तव में हम उन्हें अपनी वर्तमान प्राकृत विकारमय कुण्ठित इन्द्रियों से नहीं देख सकते। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में वर्णित भक्तियोग की पद्धति साधक को शनै-शनैः देहात्मबुद्धि से मुक्त कर पराप्रकृति में स्थित कर देगी। इस अवस्था में भक्त सब उपाधियों से मुक्त हो जाता है। तब सब दोषों से मुक्त हुई इन्द्रियाँ निरन्तर भक्तिरस के संयोग से निर्दोष हो जाती हैं। जब शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा भगवान् की सेवा की जाती है तो भक्तिरसमय जीवन में स्थिति हो जाती है। इस दिव्य जीवन में श्रीकृष्ण की सन्तुष्टि के लिये किये कार्यों का नित्य निरन्तर आस्वादन हो सकता है। भक्तियोग में नियोजित होने पर सब प्रकार के रस शाश्वत् हो जाते हैं। प्रारम्भ में आचार्य के आश्रय में विधिभक्ति में शिक्षा दी जाती है। शनैः-शनैः साधक के उन्नति करने पर उसकी भक्ति श्रीकृष्ण में रागानुगा हो उठती है। जैसा इस ग्रंथ में वर्णन किया जायगा-रस बारह प्रकार के हैं। इनमें से पाँच प्रधान रसों में श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध को फिर से स्थापित करके हम सच्चिदानन्द- मय जीवन को प्राप्त हो सकते हैं। जीवनदशा का यह प्रधान सिद्धान्त है कि हममें किसी न किसी से प्यार करने की सामान्य प्रवृत्ति रहती है। कोई भी किसी दूसरे को प्यार किये बिना जीवित नहीं रह सकता। यह प्रवृत्ति जीवमात्र में विद्यमान है। बाघ जैसे पशु में भी यह प्रेम करने की प्रवृत्ति अवश्य है, चाहे सुप्त अवस्था में ही क्यों न हो; मनुष्यों में तो यह है ही। परन्तु खोयी कड़ी यह है कि अपने प्रेम को हम कहाँ लगायें जिससे सब सुखी हो सकें। आजकल मानव-समाज अपने देश, परिवार अथवा स्वयं अपने से प्रेम करने की शिक्षा देता है; परन्तु इसकी जानकारी किसी को नहीं है कि इस प्रेम की प्रवृत्ति को कहाँ समर्पित किया जाये जिससे सबको सुख मिले। वह केन्द्र कृष्ण हैं और 'भक्तिरसामृतसिन्धु' अपने स्वरूपभूत कृष्णप्रेम को जगा कर उस अवस्था को प्राप्त हो जाने की शिक्षा देती है जिसमें शाश्वत् जीवन का आस्वादन किया जा सकता है।