भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 23

भूमिका [ ७

कुछ प्रकाशित हो जाता है। जो इस विधि को नहीं जानता वह जीवन के सार से वंचित है। जहाँ तक लौकिक पदार्थों का सम्बन्ध है, मानव सभ्यता सुखमय जीवन की ओर बहुत अधिक प्रगति कर चुकी है। परन्तु फिर भी हम सुखी नहीं हैं, क्योंकि हम सारतत्त्व को भुला बैठे हैं। यह प्राकृत आराम हमें सुखी करने को पर्याप्त नहीं है। इसका उज्ज्वल उदाहरण है— अमरीका। विश्व का सबसे धनी देश, जो सब प्रकार की प्राकृत सुविधाओं के होते हुए भी मनुष्यों के एक ऐसे वर्ग को जन्म दे रहा है जो जीवन के प्रति बिलकुल भ्रमित और निराश है। मैं इन शब्दों से उन सब भ्रमित मनुष्यों का आह्वान करता हूँ कि वे 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में निर्दिष्ट भक्तियोग की विद्या को सीखें। मुझे विश्वास है कि ऐसा करने पर उनके हृदयों में लगी हुई संसार-अग्नि तुरन्त बुझ जायगी। विषयपरायण जीवन की विधि में महान् उन्नति कर लेने पर भो हमारी सुप्त प्रेम प्रवृत्ति पूर्ण नहीं हो पाई है। यही हमारे असन्तोष का मूल कारण है। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थ हमें ऐसे आचरणीय अथवा व्यावहारिक निर्देश देगा जिनके द्वारा इस प्राकृत-जगत् में भक्तिपरायण जीवन व्यतीत कर हम इस जन्म में और अगले में भी अपनी सम्पूर्ण अभिलाषाओं को प्राप्त कर सकते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का उद्देश्य संसार की किसी विधि को धिक्कारना नहीं है; अपितु, इस प्रयास का उद्देश्य धार्मिकों, दार्शनिकों और सामान्य लोगों को श्रीकृष्ण से प्रेम करना सिखाना है। लौकिक असुविधाओं से बचना बुरा नहीं है; परन्तु साथ ही श्रीकृष्ण से प्रेम करने की कला सीख लेनी चाहिये। इस समय हम अपनी प्रेम करने की प्रवृत्ति को कितने ही प्रकार से इधर-उधर लगाने का प्रयास कर रहे हैं; परन्तु वास्तव में देखें तो पायेंगे कि यथार्थ सार अर्थात् श्रीकृष्ण हमसे दूर हैं। पेड़ की जड़ को छोड़कर हम उसके तनों और पत्तों पर जल दे रहे हैं। अपनी देह को नाना प्रकार से सुख देने के प्रयास कर रहे हैं; परन्तु उदर में भोजन पहुँचाना भूल गये हैं। जो श्रीकृष्ण को भुला बैठा है उसको अपने स्वरूप की भी विस्मृति है। असली स्वरूप का साक्षात्कार और श्रीकृष्ण का साक्षात्कार एक साथ हैं। प्रातः काल अपने को देखने का अर्थ यह है कि सूर्योदय को भी देख लिया है। सूर्य के प्रकाश के बिना कोई अपने को नहीं देख सकता। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के साक्षात्कार के बिना स्वरूप-साक्षात्कार नहीं हो सकता। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' विशेष रूप से उनके लिये है जो कृष्णभावनामृत