भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जब नन्द महाराज ने देखा कि कृष्ण कंस की यज्ञशाला में फँस गए हैं तो वे बोल पड़े, "अहो ! मेरा दुर्भाग्य तो देखो । मैंने कृष्ण को घर में ही बन्द क्यों नहीं रखा ? इसे यहाँ मथुरा क्यों लाया, क्योंकि अब यह हाथी रूप राहू इस कृष्णरूप चन्द्रमा को ग्रसना चाहता है।" यह विपत्ति के कारण विषाद करना है । श्रीमद्भागवत (१०.१४.६) में ब्रह्मा का वाक्य है, "हे नाथ ! आप अनन्त आदिपुरुष एवं मायापति सर्वव्यापक परमात्मा हैं । तनिक मेरा अपराध तो देखिये । अपनी तुच्छ शक्ति से मदमत्त हुआ मैं आपका अति- क्रमण करना चाहता था । जैसे अग्निकण अग्नि की कुछ भी हानि नहीं कर सकता, वैसे ही मेरी मोहनशक्ति आपकी परामाया को रोकने में तनिक भी सफल नहीं हो सकती । इसलिए मैं अपने को तुच्छ एवं निरर्थक समझता हूँ ।" यह अपराध करके उत्पन्न विषाद है । दैन्य दुःख, त्रास, अपराध आदि के कारण होने वाला दीनता का भाव दैन्य कहलाता है। इस अवस्था में चाटुकारिता, मन्दता, मलिनता, चिन्ता तथा जड़ता आदि होती हैं । श्रीमद्भागवत (१०.५१.५७) में राजा मुचुकुन्द कहते हैं, "हे नाथ ! पूर्वपापों के कारण मैं निरन्तर पापों से पीड़ित रहता हूँ । वासना मुझे निरन्तर सताती है । फिर भो मेरी इन्द्रियाँ विषयों से तृप्त नहीं होतीं । जिस किसी प्रकार आपकी कृपा से अब मैं शान्त हो गया हूँ, क्योंकि मैंने आपके उन चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली है, जो सदा शोक, भय और मृत्यु से मुक्त हैं। हे शरणदाता ! हे परमेश्वर ! हे परमात्मा ! कृपया मुझ दीन की रक्षा करें ।" मुचुकुन्द का यह वाक्य भवरोग के दुःख से उत्पन्न दैन्य का उदाहरण है । जब अश्वत्थामा ने उत्तरा पर ब्रह्मास्त्र चलाया तो वह अपने गर्भस्थ बालक की रक्षा के लिए आर्त्तभाव से श्रीकृष्ण की शरण में गयी और प्रार्थना करने लगी, "हे नाथ ! मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, परन्तु इस ब्रह्मास्त्र से कृपया मेरे गर्भ की रक्षा करें ।" यह त्रास से उत्पन्न दैन्य है । श्रीमद्भागवत (१०.१४.१०) में ब्रह्माजी कहते हैं, "हे अच्युत ! रजो- गुण से उत्पन्न मैं अपने को इस प्राकृत-जगत् का रचयिता समझ कर गर्वित रहा हूँ । मेरे मिथ्या अहंकाररूप घोर अंधकार ने मुझे अन्धा बना