भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६३
की अवस्था को प्राप्त हो जाता है। इस अवस्था में भक्त द्वारा अभिव्यक्त भावों को अनुभाव कहते हैं। बलि महाराज को जिस सम्भ्रम प्रीति का अनुभव हुआ था उसका वर्णन इस प्रकार है—"हे नाथ ! आपने एक साथ मुझे दण्डित भी किया है और मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा भी बरसाई है। अतएव यह निश्चित है कि यदि मैं आपके चरणकमलों के शरणागत हो जाऊँ तो फिर जीवन की किसी भी अवस्था में मुझे उद्वेग नहीं होगा। चाहे आप मुझे सारी यौगिक सिद्धियों को भोगने का अवसर दें अथवा नरक का भाग दें, मैं कभी उद्वेग में नहीं होऊँगा।" श्रीकृष्ण ने स्वयं बलि महाराज को देखने के बाद उद्धव से कहा, "हे सखे ! मैं बलि महाराज के गौरवमय चरित्र का वर्णन किस प्रकार करूँ ? यद्यपि भृगुनन्दन ने इसे शाप दिया और वामन अवतार में मैंने इससे छलपूर्वक ब्रह्माण्ड का साम्राज्य हरण कर लिया और अभी भी मैं प्रतिज्ञा को पूर्ण न करने के कारण इसकी निन्दा करता हूँ; फिर भी मैंने उसे देखा है और वह मेरे लिये प्रेम से पूर्ण है। मेरे लिए उसका प्रेम अब भी अभिव्यक्त हो रहा है।" प्रेम का यह भाव जब तीव्र हो उठता है तो उसे स्नेह कहते हैं। स्नेह की अवस्था में श्रीकृष्ण से क्षणभर का विरह भी नहीं सहा जा सकता। एक भक्त श्रीकृष्ण के सेवक दारुक से कहता है, "हे दारुक ! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि श्रीकृष्ण के विरह में तुम काष्ठवत् हो जाते हो। जब भी कोई भक्त श्रीकृष्ण को देखता है तो उसके नेत्र अश्रुधारा से भर जाते हैं; उनके विरह में तुम्हारे जैसा कोई भी भक्त कठपुतली के समान स्तम्भित खड़ा रह जाता है। इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है।" उद्धव के प्रेम-लक्षणों के सम्बन्ध में भी एक वाक्य है—"जब उन्होंने श्रीकृष्ण को देखा तो उसके नेत्र आँसुओं से भर आये, जिनके बहने से एक नदी बह चली, मानो कृष्णरूप समुद्र को समर्पण करने जा रही हो—उसी प्रकार जैसे पत्नी पति का अभिनन्दन करती है। रोमांच की अतिशयता के कारण उद्धव कदम्ब के पुष्प जैसे सुशोभित हो रहे थे। जब वे प्रार्थना करने लगे तो भक्तों के समूह में भी उनकी शोभा सबसे अधिक बढ़ गई।" स्नेह को जिस अवस्था में दुःख भी सुख प्रतीत होने लगता है उसको