भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब श्रीकृष्ण वृन्दावन को छोड़ गए, तब गोपबालकों को इस बात की बड़ी चिन्ता हुई कि कंस से उनके युद्ध में क्या परिणाम होगा । एक अन्य मित्र श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे सखे ! एक मित्र को तुम्हारे विरह ने ऐसा सताया कि उसके नेत्र रूपी कमल अश्रुधारा से अभिपूरित हो गये। अतएव निद्रारूपी काले भ्रमरों ने उसके नेत्रों में प्रवेश नहीं किया और उस स्थान को छोड़कर चले गये।" भ्रमर प्रायः मधु- संचय के लिये कमल पर मँडराया करते हैं। श्रीकृष्ण के सखा के नेत्रों को कमल की उपमा दी गई है और क्योंकि वे अश्रुधारा से पूर्ण थे, इसलिये निद्रारूपी भ्रमर उसके नेत्ररूपी कमलों से मधु का संचय नहीं कर सके और वहाँ से चले गये । भाव यह है कि विरह से अत्यधिक अभिभूत होने के कारण उसके नेत्र भर आये और वह सो न सका । यह श्रीकृष्ण के विरह में निद्रानाश का उदाहरण है। आलम्बनशून्यता का उदाहरण इस प्रकार है—"श्रीकृष्ण के वृन्दावन से मथुरा चले जाने पर श्रीकृष्ण के प्रियतम ग्वाल सखाओं के चित्त एकदम हलका हो गये और रूई के समान हवा में इधर-उधर निरा- श्रित होकर चक्कर खाने लगे।" भाव यह है कि श्रीकृष्ण के विरहवश गोपबालकों के मन बिल्कुल सारहीन हो गये । अधृति का भी एक उदा- हरण गोपबालकों में तब प्रकट हुआ जब श्रीकृष्ण मथुरा को गये थे। विरह की व्यथा में ये सब बालक अपने गोधन का ध्यान करना भूल गये और उन मधुर गीतों को भुलाने का प्रयास करने लगे जो वे गोचारण करते समय गाया करते थे। श्रीकृष्ण के विरह में उनमें जीने की भी कोई इच्छा शेष न रही । श्रीकृष्ण के विरह में होने वालीं जड़ता का वर्णन करते हुए एक सखा उनसे बोला कि उनके विरह में गोपबालक पर्वत-शिखरों पर खड़े पत्तों से रहित वृक्ष जैसे हो गये हैं। पत्तों अर्थात् वेशभूषा से रहित होने के कारण वे अत्यन्त कृश और रूखे लगते हैं। उनमें फल-फूलों अर्थात् कान्ति का भी सर्वथा अभाव हो गया है। इस प्रकार सब के सब गोपबालक पर्वत के शिखरों पर खड़े वृक्षों के समान स्तम्भित लग रहे थे। कभी-कभी उन्हें श्रीकृष्ण के विरह में व्याधि का अनुभव होता और इस प्रकार तीव्र विरहज्वर से शिथिलप्रायः होकर वे यमुना तट पर इधर-उधर टहलने -गते । श्रीकृष्णविरह में होने वाले उन्माद के भी अनेक उदाहरण हैं। जब श्रीकृष्ण वृन्दावन से चले गये तो सारे गोपबालकों को उन्माद हो