भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमधुरभक्तिरस [ ३१३ प्रिया में होने वाले भाव को पूर्वराग कहते हैं। पद्यावली में राधारानी अपनी सखी से कहती हैं, “हे सखि ! यमुना तट पर जाते हुए अकस्मात् मेरी दृष्टि के आगे नवचन्दन वर्ण श्यामल बालक आ गया। उसने मेरी ओर ऐसे देखा जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकती। परन्तु इसके बाद अब मेरा मन घर के काम-काज में बिल्कुल नहीं लगता।” यह श्रीकृष्ण के लिये पूर्वराग का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (१०.५३.२) में श्रीकृष्ण ने रुक्मिणीदेवी के पास से आये ब्राह्मण दूत से कहा है, “हे ब्राह्मण ! रुक्मिणी के समान मैं भी रात भर सो नहीं पाता। मेरा मन निरन्तर उसी में लगा रहता है। मैं जानता हूँ कि उसका भाई रुक्मी मेरे विरुद्ध है और उसी के कहने-सुनने से रुक्मिणी से मेरे विवाह को रोक दिया गया है।” यह भी पूर्वराग का लक्षण है। मान के सम्बन्ध में गीतगोविन्द में निम्नलिखित प्रसंग हैं, “जब श्रीमती राधारानी ने देखा कि श्रीकृष्ण अन्य अनेक गोपियों के संग का आनन्द ले रहे हैं तो अपने उत्कर्ष के नष्ट हो जाने के कारण उन्हें कुछ ईर्ष्या हो आई। इसलिये वे वहाँ से हटकर भ्रमरों से गुंजायमान लता मंडप में जा बैठीं और वहाँ लताओं में छिपकर एक सखी से अपनी मनोव्यथा को कहने लगीं।” यह मान का उदाहरण है। प्रवास का दृष्टान्त पद्यावली में इस प्रकार है—“हथेली के ऊपर सिर को रखकर निरन्तर आँसू बहाते हुए जिसका मुख भीग रहा है, उस कमलनयनी राधा को कृष्ण के मथुरा चले जाने के दिन से लेकर आज तक क्षणभर को भी निद्रा नहीं आई।” मुख के भीग जाने पर निद्रा का लोप हो जाता है; अतएव श्रीकृष्ण के विरह में निरन्तर रोते रहने से राधारानी के लिये सोने का प्रश्न ही नहीं बनता। 'प्रह्लादसंहिता' में उद्धव कहते हैं, “कामदेव के बाणों से पीड़ित होकर भगवान् गोविन्द रात-दिन तुम गोपियों का ही चिन्तन करते हुए न खाते-पीते हैं और न सो पाते हैं।” जब प्रेमी और प्रियतम मिलकर प्रत्यक्ष संग में एक-दूसरे का आनन्द लेते हैं तो उसे सम्भोग कहा जाता है। पद्यावली में उल्लेख है, “श्रीकृष्ण ने श्रीमती राधारानी का ऐसी विदग्धता से आलिंगन किया, मानो वे मदन महोत्सव मना रहे हों।” इस प्रकार श्रील रूपगोस्वामी अपने 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के दक्षिण विभाग की पाँचवी लहरी को समाप्त करते हैं। उनका सनातनस्वरूप भगवान् गोपाल को सादर प्रणाम है। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ मुख्य भक्तिरस निरुपणनामा पश्चिमो विभागः ॥ इति भक्तिवेदान्त भाष्ये पश्चिमो विभागः ॥३॥