भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 372, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंरसों की मैत्री-वैर स्थिति (२) [ ३४५ माधुर्य का ऐसा उत्कर्ष है कि वह अन्य सभी रसों को परास्त कर देता है । श्रील रूपगोस्वामी ने इस सन्दर्भ में टिप्पणी की है कि ऐसा प्रेममय भाव सबके लिये सम्भव नहीं है । यह तो केवल वृन्दावन की गोपियों में ही पाया जाता है । इसी प्रकार के विरोधी रसों के अन्य अनेक उदाहरण हैं, जहाँ कोई रसाभास नहीं बनता । स्वर्ग में कोई उपदेवता कहने लगा, "जिनके व्यंग्य वचन कभी व्रजवासियों के लिये हास्य के स्रोत थे वे ही श्रीकृष्ण आज कालिय नाग के फनों में फँस कर सबके अतिशय शोक के पात्र बन गये हैं।" इस उदाहरण में हास्य और करुणरस का मिश्रण है । परन्तु कोई विरोध नहीं है, क्योंकि इन दोनों ही रसों से श्रीकृष्ण के लिये दिव्य प्रीति का वर्धन हुआ है । श्रीमती राधारानी से एक बार किसी ने कहा कि यद्यपि उन्होंने सब क्रियाएँ रोक दी हैं, परन्तु फिर भी वे सब प्रकार की भक्ति के लिये प्रेरणा की परम स्रोत हैं । वह वाक्य इस प्रकार है, "हे राधिके ! श्रीकृष्ण के विरह में तुम अब ठीक उसी वृक्ष के समान सुन्दर लग रही हो जिसकी शोभा पत्तों के आवरण से ढकी हुई न हो । तुम्हारे शान्तभाव से लगता है मानो तुम ब्रह्मसाक्षात्कार में पूर्ण रूप से लीन हो चुकी हो ।" इस उदाहरण में मधुररस और शान्तरस का मिश्रण है । परन्तु मधुरता का सब प्रकार से उत्कर्ष है । ब्रह्मसाक्षात्कार वास्तव में एक रुद्ध अस्तित्व है । कृष्ण स्वयं कहते हैं, "श्रीमती राधारानी मेरे लिये मूर्तिमती शान्ति बन गई हैं । उनके कारण मैं अब अपलक रहता हूँ—उनकी ओर देखता हुआ निरन्तर ध्यानमग्न रहता हूँ । उनके कारण मैंने अपना घर भी पर्वत की कन्दरा में बना लिया है।" यह मधुर और शान्तरस के मिश्रण का उदाहरण है; परन्तु इनमें कोई अन्तर्विरोध नहीं है । "हे रम्भे तुम कौन हो ? मूर्तिमती शान्ति हूँ । फिर इस आकाश में क्या कर रही हो ? परब्रह्म का साक्षात्कार । तुमने नेत्रों को क्यों फैला रखा है ? परतत्त्व श्रीकृष्ण की अपूर्व रूपमाधुरी के दर्शन के लिये । ऐसे में तुम व्याकुल क्यों लग रही हो ? क्योंकि कामदेव क्रियाशील है ।" इस उदाहरण में विरोधी रसों के रहते भी कहीं भी रसाभास नहीं हैं, क्योंकि मधुररस ने शान्तरस को अभिभूत कर दिया है । श्रीमद्भागवत् (१०.६० ४५) में रुक्मिणीदेवी कहती हैं, "हे पतिदेव ! जो आपके चरणकमलों के मकरन्द को न सूंघती हो वह मूढ़ स्त्री ही त्वचा, लोम, नख, एवं केशों से ढके माँस, अस्थि, रक्त, कृमि, विष्टा, कफ, वात