भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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स्वच्छता भी आ जाती है। ऐसी यह विलक्षण मुखछवि है कि गोस्वामी तुलसीदासजीके शब्दोंमें कहें तो 'कहि न जात मुख बानी।' अधरोंमें अरुणिमा, दिव्य नासिका और गण्डस्थलकी दिव्यातिदिव्य, दीप्तिविशिष्ट नीलिमा और नानाविध भूषणों और कुण्डलोंकी पीतारुण जगमग ज्योतिसे ये कुन्तल अति विलक्षण सुरंजित दीप्तिका प्रकाश करते हैं। ऐसे इन दिव्य नील अलकोंपर वृन्दारण्यधामकी गो-चारण-लीलामें उठी हुई गोधूलि आकर ऐसे जमी हुई है, जैसे नीलकमलका यह पराग हो। ऐसे इस परागक्षुरित अलिकुलमालासंकुलित मुखारविन्दपर स्वेदबिन्दु प्रसन्न तुषार-बिन्दुओंके समान या दिव्यातिदिव्य मोतियोंके समान सुशोभित हो रहे हैं। ऐसे दिव्यातिदिव्य मुखारविन्दके भालदेशमें विद्युत्‌की लकीरों-सा जो दिव्य तिलक है, वह नीचेकी दोनों भौंहोंकी कमानोंसे छूटनेवाले जैसे दिव्य बाण हों। महालक्ष्मी जिस पद्ममें निवास करती हैं, उस मीनद्वययुक्त अलिकुल-समाश्रित दिव्य पद्मको तिरस्कृत करनेवाला यह दिव्यातिदिव्य मुखारविन्द है। भगवान्‌के कर्ण अति देदीप्यमान नीलवर्णके हैं, जिनमें नीचे दिव्य कुण्डल लटक रहे हैं। भगवान्‌के स्कन्ध सिंहके समान विशाल हैं। सुन्दर दिव्य कण्ठ कम्बुरेखासे युक्त है और उसमें आत्मज्योति-स्वरूप कौस्तुभमणि ऐसी शोभा पा रही है, जैसे सारी शोभाओंका यहींसे उद्गम होता हो। कण्ठमें फिर दिव्य मौक्तिकमाल और नीलपीत रत्नहार पड़ा हुआ है, नानाविध रत्नजटित मुक्ताहार तथा वन्य पुष्पमालाएँ हैं। कोई कण्ठमें कण्ठकूपतक हैं, कोई वक्षःस्थलतक हैं, कोई उदर और कटिप्रान्ततक हैं और कोई पादाम्बुजतक हैं। बड़ी ही विलक्षण शोभाका यह बड़ा ही सुन्दर कौशलपूर्ण क्रम है। ये मौक्तिकमाल कण्ठसे पादाम्बुजतक इस दिव्य मंगलमय विग्रहपर ऐसे सोह रहे हैं, जैसे महेन्द्रनीलमणिपर्वतपर गंगाकी दिव्य निर्मल धारा हो अथवा ये मुक्तामाल ऐसे सुशोभित हैं, जैसे नील आकाशमें हंसोंकी पंक्तियाँ उड़ी जाती हों। नील आकाशमें उडुगणोंके समान भगवान्‌के वक्षःस्थलपर यह रत्न अत्यन्त शोभित होते हैं; मध्य-मध्यमें महामणियाँ अनेक चन्द्रमा तथा सूर्यके समान दीप्यमान होती हैं। दिव्य दीप्त नीलवर्णपर ये नानाविध मौक्तिक, स्तबक, रत्न और वन्य पुष्प आदिके द्वारा विविध प्रकारके वर्ण परस्परसे सुरंजित हो रहे हैं। इन सबकी सम्मिलित शोभा अति विलक्षण है। इस दिव्यातिदिव्य शोभा और सौन्दर्यपर, इसके अति सुरम्य सौरभ और मधुरतम मकरन्दपर मँडराते हुए गुंजारव करनेवाले भ्रमर भगवान्‌के गुणगान करनेवाले नित्यमुक्त भक्त हैं। दिव्य विग्रहके अनुलेपनकी शोभा इस दिव्य मंगलमय विग्रहके सर्वांगमें कुंकुम- मिश्रित हरिचन्दनका ऐसा सुन्दर शुभ्र विलेपन है, जैसे महेन्द्र-नीलमणिपर्वतपर चन्द्रमाकी चन्द्रिका फैली हो और उस चन्द्रिकामें उज्ज्वल नीलिमा जगमगा रही हो। ऐसी इस उज्ज्वल नीलिमायुक्त चान्द्रमसी ज्योत्स्नासे सुशोभित स्वरूपसे दिव्यातिदिव्य अष्टविध सौगन्ध्यका प्रादुर्भाव हो रहा है। भगवान्‌के देवदुर्लभ दिव्यातिदिव्य वदनारविन्दका दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्य परम भावुकोंको ही अनुभूत होता है। इस (१) भगवदीय दिव्य- वदनारविन्दके परम दुर्लभ सौगन्ध्यके साथ, (२) सर्वांगमें हरिचन्दनका जो विलेपन है, उसका सौगन्ध्य है, (३) उस हरिचन्दनमें जो कुंकुम मिली हुई है, उसका भी एक अति मनोहर सौगन्ध्य है, (४) पुष्पमालाओंके मध्यमें जो तुलसिका है, उसका शीतल मधुर दिव्य सौगन्ध्य कुछ और ही है, फिर (५) अनेकविध सौगन्ध्योपेत वन्यपुष्पस्तबकोंका सौगन्ध्य अपनी सत्ता अलग बता रहा है, (६) हरिचन्दनका सौगन्ध्य और कुंकुम-कस्तूरीका सौगन्ध्य दोनों मिलकर एक तीसरा ही अद्भुत सौगन्ध्य अनुभूत करा रहे हैं, (७) कुंकुममिश्रित हरिचन्दन और वन्य पुष्प दोनोंके सौगन्ध्य मिलकर भी एक विलक्षण सौगन्ध्य उत्पन्न कर रहे हैं और (८) भगवदीय, वदनारविन्दका सौगन्ध्य तथा इन सब पुष्पादि