भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 553, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाँके श्रीचरणोंमें ५४३ परिणाम है। 'संकल्पस्वरूप ही सब कुछ है' इस बोधके दृढ़ होनेपर कोई भी स्थूल पदार्थ कहीं भी प्रतिरोधक नहीं होता। स्वप्न एवं संकल्पके पर्वतादि संवित्में ही विलीन हो जाते हैं। जैसे सस्पन्द वायु निस्पन्द वायुमें लीन हो जाता है, ठीक वैसे ही संवित्में ही सब संकल्पात्मक प्रपंच विलीन होता है; क्योंकि संविद् ही विभिन्न रूपसे प्रतिभासित होती है। स्वकल्पित प्रपंच ही दुःखका हेतु है मिथ्याज्ञान, अबोध आदिके कारण ही स्वप्न एवं संकल्पके पदार्थों एवं संवित्में भेद प्रतीत होता है। जैसे जल एवं द्रवत्वमें भेद नहीं है, ठीक वैसे ही यहाँ भी भेद नहीं है। स्वप्न एवं जाग्रत्में भी संवित्में परम सत्यता है। स्वप्न आदि पदार्थोंमें परम असत्यता है। स्वप्नमें क्षणमें आकाश एवं क्षणमें वही आकाश पर्वत हो जाता है। अतएव किसी सत् पदार्थके मार्जनमें क्लेश होता है, परंतु जो असत् पदार्थ है, उसके मार्जनमें क्या क्लेश ? आकाशस्वरूप अनन्त ज्ञान ही सब ज्ञेय है। अतिस्वच्छ चित्स्वरूप आकाशमें, एक चित्कणमें ही अनन्त प्रपंचकी व्यर्थ ही भ्रान्ति है। एक परमाणु एवं एक निमेषके लक्षांशमेंसे भी सहस्रों जगत् एवं सहस्रों कल्पोंका विभ्रम होता है। जैसे समुद्रमें अगणित तरंग-परम्परा प्रस्फुरित होती है, वैसे ही एक चित्परमाणुमें अनन्त सर्ग-परम्पराएँ प्रस्फुरित होती रहती हैं। सर्वशक्ति चित्स्वरूप महात्रिपुरा अन्तःकरण-सम्बन्धसे चिच्छक्तिको प्रकट करती है। सत्त्वगुणपर शान्ति, तमपर जड़ता और रजपर रागादिको व्यक्त करती है और कहीं मिश्रित गुणकार्य। सुषुप्ति, प्रलयादिमें कुछ भी नहीं प्रकट करती। व्यवहारके लिये अनेक विकल्पजाल उसीसे प्रकट होते हैं। वस्तुतः परमात्मस्वरूप त्रिपुरा सर्वथा ही प्रपंचातीत है। उसी शुद्ध चिद्रूप महादर्पणमें अनन्त जगज्जाल- परम्परा प्रतिबिम्बके तुल्य प्रतिभासित होती है। जैसे निर्वात, शान्त समुद्र ही स्पन्दवशात् तरंग, फेन, बुद्बुद आदि आकारसे प्रतिभासित होने लगता है, वैसे ही स्वच्छ, शान्त ब्रह्ममें मायावशात् अनन्त जगज्जाल प्रतीत होने लगता है। नाशोऽपि सुखयत्यज्ञमेकवस्त्वतिरागिणाम्। सूचीभूता विदेहापि परितुष्टैव राक्षसी ॥ जैसे वेतालकी कल्पनासे बालक भयभीत होता है, वैसे ही स्वकल्पित प्रपंचसे ही प्राणी दुःखी होता है। स्वकल्पित वस्तुमें ही अतिरागसे प्राणीको आत्मनाश भी सुखकर प्रतीत होता है, जैसे देहनाशमें भी विषूचिका तुष्ट हुई। रागविशेषसे ही अल्पसत्त्व प्राणी तुच्छ वस्तुके लिये तप करके उसे वरदानके रूपमें प्राप्त करना चाहता है— तुच्छोऽप्यर्थोऽल्पसत्त्वानां गच्छति प्रार्थनीयताम्। सूचीवृता पिशाचीत्वं राक्षस्या तपसा स्थितम्॥ कामनात्यागसे दृढ़बोधकी प्राप्ति असम्यग्दर्शन एवं मनके बलसे दीर्घस्वप्न ही संसार बन जाता है। परम कारणसे ही किंचिन्मात्र मननी शक्तिको धारण करनेसे चित् ही चित्त बन जाता है। फिर वही चैत्योन्मुख (दृश्यके उन्मुख) होकर प्रपंच-कल्पनाओंका मूल बनता है। जैसे चिदात्मा एवं जीवमें भेद नहीं, वैसे ही चित्त एवं जीवमें भी भेद नहीं है। सारांश यह कि जैसे जलसे भिन्न होकर तरंग नहीं होता, वैसे ही चित्तसे भिन्न होकर दृश्यप्रपंच नहीं है; क्योंकि अन्वय-व्यतिरेकसे जल होनेपर ही तरंग उपलब्ध होता है, जल न होनेपर तरंग उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही चित्तके चांचल्यके बिना प्रपंचकी प्रतीति नहीं होती। इसी तरह अखण्ड भानमें ही चित्तका भी स्फुरण होता है, अखण्ड भानके बिना चित्तका स्फुरण ही असम्भव है। इसीलिये बोधमात्रसे संसारव्याधिकी चिकित्सा हो सकती है। यदि वासनात्यागपूर्वक सर्वत्याग सम्पन्न हो तो तत्क्षण ही मुक्ति हस्तगत होती है— यदि सर्वं परित्यज्य तिष्ठस्युत्क्रान्तवासनः। अमुनैव निमेषेण तन्मुक्तोऽसि न संशयः॥ जैसे ठीक वीक्षणसे ही रज्जुसे सर्पभ्रम हट जाता है, वैसे ही विचारमात्रसे संसृति मिट जाती है। जिन-जिन पदार्थोंमें अभिलाष है, उन-उन पदार्थोंका