भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० भक्तिसुधा ८. वाम गण्डस्थलकी पतनभूमिपर अर्बुदाचलपीठ हुआ और 'ऋकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वहाँ अम्बिका नामकी शक्ति है, यहाँ वाममार्गकी सिद्धि होती है तथा दक्षिणमार्गमें विघ्न होते हैं। ९. दक्षिण गण्डस्थलके पतनस्थानमें आम्रातकेश्वर पीठ हुआ, 'लृकार'-की उत्पत्ति हुई। वह धनदादि यक्षिणियोंका निवासस्थान है। १०. नखोंके निपतनस्थलमें एकाग्रपीठ हुआ, 'ॡकार'-की उत्पत्ति हुई। वह पीठ विद्याप्रदायक है। ११. त्रिवलिके पतनस्थलमें त्रिस्रोतपीठ हुआ और वहाँ 'एकार' का जन्म हुआ। वस्त्रके तीन खण्ड उसके पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिणमें गिरे, वे तीन उपपीठ हुए। गृहस्थ द्विजको पौष्टिक मन्त्रोंकी सिद्धि वहाँ होती है। १२. नाभिकी पतनभूमि कामकोटिपीठ हुई, वहाँ 'ऐकार' का प्रादुर्भाव हुआ, समस्त काममन्त्रोंकी सिद्धि वहाँ होती है, उसके चारों दिशाओंमें चार उपपीठ हैं, जहाँ अप्सराएँ निवास करती हैं। १३. अंगुलियोंके पतनस्थल हिमालयपर्वतमें कैलासपीठ हुआ, 'ओकार' का प्राकट्य हुआ। अंगुलियाँ लिंगरूपमें प्रतिष्ठित हुईं, वहाँ करमालासे मन्त्रजप करनेपर तत्क्षण सिद्धि होती है। १४. दन्तोंके पतनस्थलमें भृगुपीठ हुआ, वहाँसे 'औकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वैदिकादि मन्त्र वहाँ सिद्ध होते हैं। १५. दक्षिण करतलके पतनस्थानमें केदारपीठ हुआ, वहाँ 'अं' की उत्पत्ति हुई। उसके दक्षिणमें कंकणके पतनस्थानमें अगस्त्याश्रम नामक सिद्ध उपपीठ हुआ और उसके पश्चिममें मुद्रिकाके पतनस्थलमें इन्द्राक्षी उपपीठ हुआ। उसके पश्चिममें वलयके पतनस्थलमें रेवती-तटपर राजराजेश्वरी उपपीठ हुआ। १६. वाम गण्डकी निपातभूमिपर चन्द्रपुरपीठ हुआ, 'अः' की उत्पत्ति हुई। सभी मन्त्र वहाँ सिद्ध होते हैं। १७. जहाँ मस्तकका पतन हुआ, वहाँ श्रीपीठ हुआ और 'ककार' का प्रादुर्भाव हुआ। कलिमें पापी जीवोंका वहाँ पहुँचना दुर्लभ है। उसके पूर्वमें कर्णाभरणके पतनसे उपपीठ हुआ, जहाँ ब्रह्मविद्या- प्रकाशिका ब्राह्मी शक्तिका निवास है। उससे अग्निकोणमें कर्णार्द्धाभरणके पतनसे दूसरा उपपीठ हुआ, जहाँ मुखशुद्धकरी माहेश्वरी शक्ति है। दक्षिणमें पत्रवल्लीकी पातभूमिमें कौमारी शक्तियुक्त तीसरा उपपीठ हुआ। नैर्ऋत्यमें कण्ठमालके निपातस्थलमें ऐन्द्रजालविद्या- सिद्धिप्रद वैष्णवीशक्ति-समन्वित चौथा उपपीठ हुआ। पश्चिममें नासा-मौक्तिकके पतनस्थानमें वाराही शक्त्यधिष्ठित पाँचवाँ उपपीठ हुआ। वायुकोणमें मस्तकाभरणके पतनस्थानमें चामुण्डा शक्तियुक्त क्षुद्रदेवता-सिद्धिकर छठा उपपीठ हुआ और ईशानमें केशाभरणके पतनसे महालक्ष्मीसे अधिष्ठित सातवाँ उपपीठ हुआ। १८. बाहुके पतनस्थलमें अमरकण्टकपर्वतपर ओंकारक्षेत्रपीठ हुआ। वहाँ 'खकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वह पीठ नर्मदासे अधिष्ठित है, वहाँ तप करनेवाले महर्षि जीवन्मुक्त हो गये। उसके ऊपरमें कंचुकीकी पतनभूमिमें उपपीठ हुआ, जो ज्योतिर्मन्त्र- प्रकाशक एवं ज्योतिष्मतीसे अधिष्ठित है। १९. वक्षःस्थलके पतनस्थलमें एक पीठ हुआ और 'गकार' की उत्पत्ति हुई। अग्निने वहाँ तपस्या की और देवमुखत्वको प्राप्त होकर वे ज्वालामुखीसंज्ञक उपपीठमें स्थित हुए। २०. वामस्कन्धके पतनस्थानमें मालवपीठ हुआ, वहाँ 'घकार' की उत्पत्ति हुई। गन्धर्वोंने रागज्ञानके लिये तपस्याकर वहाँ सिद्धि पायी। २१. दक्षिण कक्षका जहाँ पात हुआ, वहाँ कुलान्तकपीठ हुआ एवं 'ङकार' की उत्पत्ति हुई। विद्वेषण, उच्चाटन, मारणके प्रयोग वहाँ सिद्ध होते हैं। २२. जहाँ वाम कक्षका पतन हुआ, वहाँ कोट्टकपीठ हुआ और 'चकार' का प्राकट्य हुआ। वहाँ राक्षसोंने सिद्धि प्राप्त की है। २३. जठरदेशके पतनस्थलमें गोकर्णपीठ हुआ