भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 140 में से
संदर्भ में पढ़ेंदैवी प्रेम की मानवी विवेचना १०७
और तुम इस खेल में सहायता कर रहे हो, तभी दुःख और कष्ट तुम्हारे पास आते हैं; तब हृदय भारी हो जाता है और संसार अपने प्रचण्ड बोझ से तुम्हें दबा देता है । पर ज्योंही तुम इस दो पल के जीवन की परिवर्तनशील घटनाओं को सत्य समझना छोड़ देते हो और इस संसार को एक क्रीड़ाभूमि तथा अपने आपको भगवान की क्रीड़ा में एक सखा-संगी सोचने लगते हो, त्योंही दुःख-कष्ट चला जाता है । वे तो प्रत्येक अणु-परमाणु में खेल रहे हैं । वे तो खेलते-खेलते ही पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र आदि का निर्माण कर रहे हैं। वे तो मानव-हृदय, प्राणियों और पेड़-पौधों के साथ क्रीड़ा कर रहे है। हम मानो उनके शतरंज के मोहरे हैं । वे मोहरों को शतरंज के खानों में बिठाकर इधर-उधर चला रहे हैं । वे हमें कभी एक प्रकार से सजाते हैं और कभी दूसरे प्रकार से--हम भी जाने या अनजाने उनके खेल में सहायता कर रहे हैं । अहा, कैसा आनन्द है ! हम सब उनके खेल के साथी जो हैं !
इसके बाद है 'वात्सल्य'-प्रेम । उसमें भगवान का चिन्तन पिता-रूप से न करके, सन्तान-रूप से करना पड़ता है । हो सकता है, यह कुछ अजीब-सा मालूम हो; पर उसका उद्देश्य है--अपनी भगवान सम्बन्धी धारणा में से ऐश्वर्य के समस्त भाव दूर कर देना । ऐश्वर्य की भावना के साथ ही भय आता है । पर प्रेम में भय का कोई स्थान नहीं । यह सत्य है कि चरित्र-गठन के लिए भक्ति और आज्ञा-पालन आवश्यक हैं, पर जब एक बार चरित्र गठित हो जाता है--जब प्रेमी शान्त-प्रेम का आस्वादन कर लेता है और जब प्रेम की प्रबल उन्मत्तता का भी उसे थोड़ासा अनुभव हो जाता है, तब उसके लिए नीति-शास्त्र और