भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
DevanagariHindipublished140 पृष्ठ
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दैवी प्रेम की मानवी विवेचना ११३
प्रकार उनकी बाँसुरी की मधुर तान सुनते ही चिर-धन्या गोपियाँ सब कुछ भूलकर, इस संसार और इसके समस्त बन्धनों को भूलकर, यहाँ के सारे कर्तव्य तथा सुख-दुःख को बिसराकर, उन्मत्त-सी उनसे मिलने के लिए छूट पड़ती थीं—यह सब मानवी भाषा द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता ! हे मानव, तुम दैवी प्रेम की बातें तो करते हो, पर साथ ही इस संसार की असार वस्तुओं में भी मन दिए रहते हो। क्या तुम सच्चे हो—क्या तुम्हारा मन और मुख एक है ? “जहाँ राम हैं, वहाँ काम नहीं, और जहाँ काम है, वहाँ राम नहीं।”* वे दोनों कभी एक साथ नहीं रह सकते--प्रकाश और अन्धकार क्या कभी एक साथ रहे हैं ?
* जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम।
तुलसी कबहुँ होत नहिं, रवि रजनी इक ठाम ॥—गो० तुलसीदास