भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 140 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के लक्षण
निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को भक्तियोग कहते हैं। इस खोज का आरम्भ, मध्य और अन्त प्रेम में होता है। ईश्वर के प्रति एक क्षण की भी प्रेमोन्मत्तता हमारे लिए शाश्वत मुक्ति की देनेवाली होती है। भक्तिसूत्र में नारदजी कहते हैं, "भगवान के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है।" "जब मनुष्य इसे प्राप्त कर लेता है, तो सभी उसके प्रेम-पात्र बन जाते हैं। वह किसी से घृणा नहीं करता; वह सदा के लिए सन्तुष्ट हो जाता है।" "इस प्रेम से किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जब तक सांसारिक वासनाएँ घर किए रहती हैं, तब तक इस प्रेम का उदय ही नहीं होता।" "भक्ति कर्म से श्रेष्ठ है और ज्ञान तथा योग से भी उच्च है," क्योंकि इन सबका एक-न-एक लक्ष्य है ही, पर "भक्ति स्वयं ही साध्य और साधनस्वरूपा है।"*
हमारे देश के साधु-महापुरुषों के बीच भक्ति ही चर्चा का एक विषय रही है। भक्ति की विशेष रूप से व्याख्या करनेवाले शाण्डिल्य और नारद जैसे महापुरुषों को छोड़ देने पर भी, स्पष्टतः ज्ञानमार्ग के समर्थक, व्याससूत्र के महान् भाष्यकारों ने भी भक्ति के सम्बन्ध में हमें बहुत-कुछ दर्शाया है। भले ही उन भाष्यकारों ने,
* सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा। नारदभक्तिसूत्र, प्रथम अनुवाक, द्वितीय सूत्र। सा न कामयमाना, निरोधरूपत्वात्। ,, द्वितीय अनुवाक, प्रथम सूत्र। सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्य अपि अधिकतरा। ,, चतुर्थ अनु०, २५ सूत्र। स्वयं फलरूपता इति ब्रह्मकुमाराः। ,, ,, ३० सूत्र।