भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के लक्षण ९
है और इसी प्रकार पूर्ण-ज्ञान के साथ पूर्ण भक्ति भी आप ही आ जाती है।
इस बात को ध्यान में रखते हुए हम अब यह समझने का प्रयत्न करें कि इस विषय में महान् वेदान्त-भाष्यकारों का क्या कथन है। 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' सूत्र की व्याख्या करते हुए भगवान् शंकराचार्य कहते हैं, "लोग ऐसा कहते हैं, 'वह गुरु का भक्त है, वह राजा का भक्त है,' और वे यह बात उस व्यक्ति को सम्बोधित कर कहते हैं, जो गुरु या राजा का अनुसरण करता है और इस प्रकार यह अनुसरण ही जिसके जीवन का ध्येय है। इसी प्रकार, जब वे कहते हैं, 'एक पतिव्रता स्त्री अपने विदेश-गए पति का ध्यान करती है,' तो यहाँ भी एक प्रकार से उत्कण्ठा-युक्त निरन्तर स्मृति को ही लक्ष्य किया गया है।"* शंकराचार्य के मतानुसार यही भक्ति है।
इसी प्रकार 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' सूत्र की व्याख्या करते हुए भगवान् रामानुज कहते हैं —
"एक पात्र से दूसरे पात्र में तेल ढालने पर जिस प्रकार वह एक अखण्ड धारा में गिरता है, उसी प्रकार किसी ध्येय वस्तु के निरन्तर स्मरण को ध्यान कहते हैं। 'जब इस तरह की ध्यानावस्था ईश्वर के सम्बन्ध में प्राप्त हो जाती है, तो सारे बन्धन टूट जाते हैं।' इस प्रकार, शास्त्रों में इस निरन्तर स्मरण को मुक्ति का साधन बतलाया है। फिर, यह स्मृति दर्शन के ही समान है, क्योंकि उसका तात्पर्य इस शास्त्रोक्त
- तथा हि लोके 'गुरुम् उपास्ते' 'राजानम् उपास्ते' इति च यः तात्पर्येण गुरु-आदीन् अनुवर्तते, सः एवम् उच्यते। तथा 'ध्यायति प्रोषितनाथा पतिम्' इति या निरन्तरस्मरणा पतिं प्रति सोत्कंठा सा एवम् अभिधीयते। —ब्रह्मसूत्र, शांकर भाष्य, ४।१।१