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भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा

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२६ भक्तियोग

प्रचुरता है। जो सब शुष्क, मतान्ध धर्म-प्रणालियाँ इस बात का प्रयत्न करती हैं कि जो कुछ कवित्वमय, सुन्दर और महान् है, जो कुछ भगवत्प्राप्ति के मार्ग में गिरते-पड़ते अग्रसर होनेवाले सुकुमार मन के लिए अवलम्बनस्वरूप है, उस सबको नष्ट कर डालें; जो धर्मप्रणालियाँ धर्म-प्रासाद के आधारस्वरूप स्तम्भों को ही ढहा देने का प्रयत्न करती हैं; जो सत्य के सम्बन्ध में अज्ञान और भ्रमपूर्ण धारणा लेकर इस बात के यत्नशील हैं कि जो कुछ जीवन के लिए संजीवनीस्वरूप है, जो कुछ मानवात्मारूपी क्षेत्र में लहलहाती हुई धर्म-लता के लिए पालक एवं पोषक है, वह सब नष्ट हो जाय--उन धर्म-प्रणालियों को यह शीघ्र अनुभव हो जाता है कि उनमें जो कुछ रह गया है, वह है केवल एक खोखलापन--अनन्त शब्दराशि और कोरे तर्क-वितर्कों का एक स्तूप मात्र, जिसमें शायद एक प्रकार की सामाजिक सफाई या तथाकथित सुधार की थोड़ीसी गंध भर बच रही है। जिनका धर्म इस प्रकार का है, उनमें से अधिकतर लोग जानते या न जानते हुए जड़वादी हैं; उनके ऐहिक व पारलौकिक जीवन का ध्येय केवल भोग है; वही उनकी दृष्टि में मानव-जीवन का सर्वस्व है, वही उनका इष्टापूर्त है। मनुष्य के ऐहिक सुख-स्वाच्छन्द्य के लिए रास्ता साफ कर देना आदि कार्य ही उनके मत में मानव-जीवन का सर्वस्व है। अज्ञान और मतान्धता के इस विचित्र मिश्रण में रँगे हुए ये लोग जितने शीघ्र अपने असली रंग में आ जायें और जितनी जल्दी नास्तिकों और जड़वादियों के दल में जाकर शामिल हो जायें (क्योंकि असल में वे हैं उसी के योग्य), संसार का उतना ही मंगल है। धर्मानुष्ठान और आध्यात्मिक अनुभूति