भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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भक्तियोग
गुरु का काम यह है कि ही वे शिष्य में आध्यात्मिक शक्ति का संचार कर दें, न कि शिष्य की बुद्धिवृत्ति अथवा अन्य किसी शक्ति को उत्तेजित मात्र करें। यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है कि गुरु से शिष्य में सचमुच एक शक्ति आ रही है। अतः गुरु का शुद्धचित्त होना आवश्यक है।
गुरु के लिए तीसरी आवश्यक बात है—उद्देश। गुरु को धन, नाम या यश सम्बन्धी स्वार्थ-सिद्धि के हेतु धर्म-शिक्षा नहीं देनी चाहिए। उनके कार्य तो सारी मानव-जाति के प्रति विशुद्ध प्रेम से ही प्रेरित हों। आध्यात्मिक शक्ति का संचार केवल शुद्ध प्रेम के माध्यम से ही हो सकता है। किसी प्रकार का स्वार्थपूर्ण भाव, जैसे कि लाभ अथवा यश की इच्छा तुरन्त ही इस प्रेमरूपी माध्यम को नष्ट कर देगा। भगवान् प्रेमस्वरूप हैं, और जिन्होंने इस तत्व की उपलब्धि कर ली है, वे ही मनुष्य को शुद्धसत्व होने और ईश्वर को जानने की शिक्षा दे सकते हैं।
जब देखो कि तुम्हारे गुरु में ये सब लक्षण विद्यमान हैं, तो फिर तुम्हें कोई आशंका नहीं। अन्यथा उनसे शिक्षा ग्रहण करना ठीक नहीं; क्योंकि तब साधु-भाव संचरित होने के बदले असाधु-भाव के संचरित हो जाने का बड़ा भय रहता है। अतः इस प्रकार के खतरे से हमें सब प्रकार से बचना चाहिए। केवल वही "जो शास्त्रज्ञ, निष्पाप, कामगन्धहीन और श्रेष्ठ ब्रह्मवित् है,"* सच्चा गुरु है।
जो कुछ कहा गया, उससे यह सहज ही मालूम हो जायगा
* श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतो यो ब्रह्मवित्तमः ।
—विवेकचूडामणि, ३४