भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतीक तथा प्रतिमा-उपासना
अब हम प्रतीकोपासना तथा प्रतिमा-पूजन का विवेचन करेंगे। प्रतीक का अर्थ है वे वस्तुएँ, जो थोड़े-बहुत अंश में ब्रह्म के स्थान में उपास्य-रूप से ली जा सकती हैं। प्रतीक द्वारा ईश्वरोपासना का क्या अर्थ है ? इस सम्बन्ध में भगवान रामानुज कहते हैं, "जो वस्तु ब्रह्म नहीं है, उसमें ब्रह्मबुद्धि करके ब्रह्म का अनुसन्धान (प्रतीकोपासना कहलाता है) ।"* भगवान शंकराचार्य कहते हैं, "मन की ब्रह्म-रूप से उपासना करो, यह आध्यात्मिक उपासना है; और आकाश ब्रह्म है, यह आधिदैविक।" मन आभ्यन्तरिक प्रतीक है और आकाश बाह्य। इन दोनों की ही उपासना ब्रह्म के रूप में करनी होगी। वे कहते हैं, "इसी प्रकार--'आदित्य ही ब्रह्म है, यह आदेश है'.. 'जो नाम को ब्रह्म के रूप में भजता है'--इन सब वाक्यों से प्रतीकोपासना के सम्बन्ध में संशय उत्पन्न होता है... ।" ६ प्रतीक शब्द का अर्थ है--बाहर की ओर जाना, और प्रतीकोपासना का अर्थ है--ब्रह्म के स्थान में ऐसी किसी वस्तु की उपासना करना, जो कुछ या अधिक अंशों में ब्रह्म के सदृश हो, पर स्वयं ब्रह्म न हो। श्रुतियों में वर्णित प्रतीकों के अतिरिक्त पुराणों और तंत्रशास्त्रों में भी प्रतीकों का उल्लेख है। सब प्रकार की पितृ-
* अब्रह्मणि ब्रह्मदृष्ट्या अनुसंधानम्। —ब्रह्मसूत्र, रामानुजभाष्य, ४।१।५
६ 'मनो ब्रह्म इति उपासीत, इति अध्यात्मम्।'
'अथ आधिदैवतम् आकाशः ब्रह्म इति।'
'तथा आदित्यः ब्रह्म इति आदेशः।'
'स यः नाम ब्रह्म इति उपास्ते' इति एवम् आदिषु
प्रतीकोपासनेषु संशयः। —ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य, ४।१।५