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भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा

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प्रतीक तथा प्रतिमा-उपासना ५३

की उपासना एक कर्म मात्र है। और वह एक विद्या होने के कारण, उपासक उस विशेष विद्या का फल भी प्राप्त करता है। परन्तु जब उस देवता या उस पुरुष को ब्रह्मरूप मानकर उसकी उपासना की जाती है, तो उससे वही फल प्राप्त होता है, जो ईश्वरोपासना से। इसी से यह स्पष्ट है कि श्रुतियों और स्मृतियों के अनेक स्थलों में किस प्रकार किसी देवता, महापुरुष अथवा अन्य किसी अलौकिक पुरुष को लिया गया है, और उन्हें उनके देवत्व आदि स्वभाव से ऊपर उठा, उनकी ब्रह्मरूप से उपासना की गई है। अद्वैतवादी कहते हैं, 'नाम-रूप को अलग कर लेने पर क्या प्रत्येक वस्तु ब्रह्म नहीं है?' विशिष्टाद्वैतवादी कहते हैं, 'वे प्रभु क्या सबकी अन्तरात्मा नहीं हैं?' शंकराचार्य अपने ब्रह्मसूत्रभाष्य में कहते हैं, "आदित्य आदि की उपासना का फल वह ब्रह्म ही देता है, क्योंकि वही सबका नियन्ता है। जिस प्रकार प्रतिमा में विष्णु-दृष्टि आदि करनी पड़ती है, उसी प्रकार प्रतीकों में भी ब्रह्म-दृष्टि करनी पड़ती है। अतएव समझना होगा कि यहाँ पर वास्तव में ब्रह्म की ही उपासना की जा रही है।"§

प्रतीक के सम्बन्ध में जो सब बातें कही गई हैं, वे सब प्रतिमा के सम्बन्ध में भी घटती हैं—अर्थात् यदि प्रतिमा किसी देवता या किसी महापुरुष की सूचक हो, तो ऐसी उपासना भक्ति-प्रसूत नहीं है और वह हमें मुक्ति नहीं दे सकती। पर


§ फलम् आदित्यादि-उपासनेषु ब्रह्म एव दास्यति सर्वाध्यक्षत्वात् ।
ईदृशं च अत्र ब्रह्मणः उपास्यत्वं, यत् प्रतीकेषु तद्दृष्ट्यध्यारोपणं प्रतिमादिषु इव विष्णवादीनाम् ।
ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य, ४।१।५