भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 140 में से
संदर्भ में पढ़ें५८
भक्तियोग
इष्टनिष्ठा का भाव प्रकट करने के लिए यह एक अत्यन्त हृदयस्पर्शी और आलंकारिक उदाहरण है, और इतनी सुन्दर उपमा शायद ही पहले कभी दी गई हो। साधक के लिए आरम्भिक दशा में यह एकनिष्ठा नितान्त आवश्यक है। हनुमानजी के समान उसे भी यह भाव रखना चाहिए, "यद्यपि परमात्मदृष्टि से लक्ष्मीपति और सीतापति दोनों एक हैं, तथापि मेरे सर्वस्व तो वे ही कमललोचन श्रीराम हैं।"* अथवा हिन्दी के एक सन्त कवि ने जैसा कहा है, "सबके साथ बैठो, सबके साथ मिष्ट भाषण करो, सबका नाम लो और सबसे 'हाँ हाँ' कहते रहो, पर अपना स्थान मत छोड़ो—अर्थात् अपना भाव दृढ़ रखो,"१) उसे भी ऐसा ही करना चाहिए। तब यदि साधक सच्चे, निष्कपट भाव से साधना करे, तो गुरु के दिए हुए इस बीज-मंत्र के प्रभाव से ही पराभक्ति और परम ज्ञानरूप विराट् वटवृक्ष उत्पन्न होकर, सब दिशाओं में अपनी शाखाएँ और जड़ें फैलाता हुआ धर्म के सम्पूर्ण क्षेत्र को आच्छादित कर लेगा। तभी सच्चे भक्त को यह अनुभव होगा कि उसका अपना ही इष्टदेवता विभिन्न सम्प्रदायों में विभिन्न नामों और विभिन्न रूपों से पूजित हो रहा है।
* श्रीनाथे जानकीनाथे अभेदः परमात्मनि।
तथापि मम सर्वस्वं रामः कमललोचनः॥
१) सबसे वसिये सबसे रसिये, सबका लीजिये नाम।
हाँ जी हाँ जी करते रहिये, बैठिये अपने ठाम॥