भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्त का वैराग्य—प्रेमजन्य ७५
"हे प्रिये, कोई स्त्री अपने पति को पति के लिए प्यार नहीं करती; पति के अन्तरस्थ आत्मा के लिए ही पत्नी उसे प्यार करती है।"* प्रेमिका पत्नियाँ चाहे यह जानती हों अथवा नहीं, पर है यह सत्य। "हे प्रिये, पत्नी के लिए पत्नी को कोई प्यार नहीं करता परन्तु पत्नी के अन्तरस्थ आत्मा के लिए ही पति उसे प्यार करता है।"† इसी प्रकार, संसार में जब कोई अपने बच्चे अथवा अन्य किसी से प्रेम करता है, तो वह वास्तव में उसके अन्तरस्थ आत्मा के लिए ही उससे प्रेम करता है। भगवान मानो एक बड़े चुंबक हैं और हम सब लोहे की रेत के समान हैं। हम लोग उनके द्वारा सतत खींचे जा रहे हैं। हम सभी उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं। संसार में हम जो नानाविध प्रयत्न करते हैं, वे सब केवल स्वार्थ के लिए नहीं हो सकते। अज्ञानी लोग जानते नहीं कि उनके जीवन का उद्देश्य क्या है। वास्तव में वे लगातार परमात्मारूप उस बड़े चुम्बक की ओर ही अग्रसर हो रहे हैं। हमारे इस अविराम, कठोर जीवन-संग्राम का लक्ष्य है—अन्त में उनके निकट पहुँचकर उनके साथ एकीभूत हो जाना।
भक्तियोगी इस जीवन-संग्राम का अर्थ भलीभाँति जानता है। वह ऐसे संग्रामों की एक लम्बी परम्परा में से पार हो चुका है और वह जानता है कि उनका लक्ष्य क्या है। उनसे होनेवाले द्वन्द्वों से छुटकारा पाने की उसकी तीव्र आकांक्षा रहती
* न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनः तु कामाय पतिः प्रियो भवति। —बृहदारण्यक उपनिषद्, २।४
† न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति, आत्मनः तु कामाय जाया प्रिया भवति। —बृहदारण्यक उपनिषद्, २।४