भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् ९५९ कालिङ्ग मान आधुनिक मान ४ प्रस्थ का १ आढक = २५६ भर (३ से. ३ छ. १ भर) ४ आढक का १ द्रोण = १०२४ भर (१२ से १३ छ. ४) भर) २ द्रोण का १ शूर्प = २०४८ भर (२५ सेर ९ छ. ३) भर) २ शूर्प की १ द्रोणी = ४०९६ भर (१ म. ११ सेर ३ छ. १) भर) ४ द्रोणी की १ खारी = १६३८४ भर (५ मन ४ सेर १२ छ. ४) भर) २००० पल का १ भार = ८००० भर (२ मन २० सेर) १०० पल की १ तुला = ४०० भर (५ सेर) इति कालिङ्गमानं समाप्तम्। इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे पूर्वखण्डे परिभाषादि- प्रकरणे प्रथमं मानपरिभाषाख्यं प्रकरणं समाप्तम्।।१।। अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् ।।२।। अथ भेषजानां विधानानि । तत्रादौ कषायभेदानाह- स्वरसश्च तथा कल्कः क्वाथश्च हिमफाण्टकौ। ज्ञेयाः कषायाः पञ्चैते लघवः स्युर्यथोत्तरम् ।।१।। ओषधियों के बनाने में प्रथम कषाय के भेद-(१) स्वरस, (२) कल्क, (३) क्वाथ, (४) हिम और (५) फाण्ट ये ५ प्रकार के कषाय होते हैं। ये एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर लघु होते हैं अर्थात् स्वरस की अपेक्षा कल्क और क्वाथ की अपेक्षा क्वाथ लघु होता है। इसी भाँति हिम और फाण्ट को भी उत्तरोत्तर लघु समझना चाहिये ।।१।। अथ स्वरसविधिमाह- अहतात्तत्क्षणाकृष्टाद् द्रव्यात्क्षुण्णात्समुद्धवेत्। वस्त्रनिष्पीडितो यश्च स्वरसो रस उच्यते ।।२।। कुडवं चूर्णितं द्रव्यं क्षिप्तञ्च द्विगुणे जले। अहोरात्रं स्थितं तस्माद्द्भवेद्वा रस उत्तमः ।।३।। ❖ अहताद्=शीताग्निकीटादिभिरनुपहतात्। क्षुण्णात्=संपिष्टात् ।।२।। चूर्णितं=चूर्णी कृतम् ।।३।। स्वरस बनाने की विधि-शीत (पाला), अग्नि तथा कीड़े आदि से खराब नहीं हुई एवं तत्काल की लाई हुई गीली और भलीभाँति पीसी हुई ओषधियों से जो रस कपड़े से छान कर निकाला जाता है उसे 'स्वरस' कहते हैं। अथवा चूर्ण किये हुये १ कुडव (१६ तोले) द्रव्य को लेकर दुगुने (३२ तोले) जल में एक दिन रात भर भिगो कर रख देने के उपरान्त जो कपड़े से छान कर रस निकाला जाता है उसे भी उत्तम ही 'स्वरस' कहते हैं ।।२-३।। यहाँ 'अहतात्' पद का 'शीत, अग्नि तथा कीड़े आदि से खराब नहीं हुई' और 'क्षुण्णात्' पद का 'भली भाँति पीसी हुई' तथा 'चूर्णितम्' इस पद का 'चूर्ण किये हुये' यह अर्थ समझना चाहिये ।। आदाय शुष्कद्रव्यं वा स्वरसानामसंभवे। जलेऽष्टगुणिते साध्यं पादशिष्टं च गृह्यते ।।४।। अथवा जहाँ पर स्वरस बनाने का सम्भव न हो वहाँ सूखे द्रव्यों को लेकर उसे अठगुने जल के साथ हँड़िया में रख कर औंटाये किन्तु मुँह हँड़िये का खुला रखे। जब चौथाई जल शेष रहे तब उतार छान कर काम में ले ।।४।।