भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१००८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बलवन्तं कफव्याप्तं हल्लासादिनिपीडितम् । तथा वमनसात्म्यञ्च धीरचित्तञ्च वामयेत् ।। ३ ।। विषदोषे स्तन्यरोगे मन्देऽग्नौ श्लीपदेऽर्बुदे । हृद्रोगे कुष्ठवीसर्पमेहाजीर्णभ्रमेषु च ।। ४ ।। विदारिकाऽपचीकासश्वासपीनसवृद्धिषु । अपस्मारे ज्वरोन्मादे तथा रक्तातिसारिषु ।। ५ ।। नासाताल्वोष्ठपाकेषु कर्णस्रावेऽधिजिह्वके । गलशुण्ड्यामतीसारे पित्तश्लेष्मगदे तथा ।। मेदोगदेऽरुचौ चैव वमनं कारयेद्भिषक ।। ६ ।। वमन कर्म में प्रथम वमन के योग्य समय और रोगियों का निर्देश-चतुर वैद्य को चाहिये कि वह शरत् (क्वार, कार्तिक) ऋतु, वसन्त (चैत, वैशाख) ऋतु तथा वर्षा (सावन, भादो) ऋतु इन समयों में मनुष्यों को वमन करावे तथा रेचन (जुलाव) दे । जो मनुष्य बलवान हो या कफ से व्याप्त हो वा हल्लास (उबकाई) आदि रोग से पीड़ित हो तथा धीर चित्त बाला हो और जिसे वमन कराना प्रकृति के अनुकूल पड़ता हो उसे वमन करावे । विषदोष (विषसम्बन्धी दोष), स्तन्य रोग (दूषित दुग्ध पीने से उत्पन्न हुआ बालकों का रोग) तथा अग्नि मन्द होने पर एवं श्लीपद (फीलपाँव), अर्बुद, हृद्रोग, कुष्ठ, वीसर्प, मेदरोग, अजीर्ण, भ्रम, विदारिका, अपची, खाँसी, श्वास (दमा), पीनस, वृद्धि (अण्डकोश वृद्धि), मिर्गी, ज्वर, उन्माद, रक्तातिसार इन रोगों में नासिका (नाक) तालु तथा ओष्ठ के पकने पर, कर्णस्राव (कान बहना), अधिजिह्वक, गलशुण्डी, अतीसार, पित्त तथा कफ सम्बन्धी रोग, मेदरोग और अरुचि इन सब रोगों में रोगी को वमन करावे ।।२-६।। ❖ स्तन्यरोगे=दुष्टदुग्धजनिते बालस्य रोगे ।। २-६।। यहाँ 'स्तन्यरोग' पद का 'दूषित दुग्ध पीने से उत्पन्न हुआ बालकों का रोग' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२-६।। अथ वमनानर्हजनानाह- न वामनीयस्तिमरी न गुल्मी नोदरी कृशः । नातिवृद्धो गर्भिणी च न स्थूलो न क्षतातुरः ।। मदात्त बालको रूक्षः क्षुधितश्च निरूहितः । उदावर्त्तूर्ध्वरक्ती च दुश्छर्द्यः केवलानिली ।। पाण्डुरोगी कृमिव्याप्तः पवनात्स्वरघातवान् ।। ९ ।। एतेऽप्यजीर्णव्यथिता वाग्या ये विषपीडिताः । कफव्याप्ताश्च ते वाभ्या मधुकक्वाथपानतः ।। वमन कराने के अयोग्य लोगों का निर्देश-जो लोग तिमिर, गुल्म तथा उदर रोग वाले हों या कृश (दुर्बल) शरीर तथा अत्यन्त वृद्ध हों एवं गर्भिणी स्त्री, स्थूल शरीर वाले, क्षत (घाव) से व्याकुल, मद से पीड़ित, बालक, रूक्ष शरीरवाले या भूखे हों और जिन्हें निरूहण बस्ति दी गई हो या जो उदावर्त्त रोग वाले हों या जिनके नाक, आँख, कान तथा मुख की राह से रक्त गिरता हो या जो रूक्ष तथा कठिन द्रव्य खा लिये हों अथवा जो केवल वातरोग से पीड़ित हों या पाण्डुरोगी हों वा जिनके उदर में क्रिमि पड़ गये हों तथा वायु से जिनका स्वरभङ्ग हो गया हो ऐसे लोगों को वमन कराना उचित नहीं है । किन्तु ऐसे लोग भी यदि अजीर्ण होने से या विष से पीड़ित हों अथवा कफ से व्याप्त हों अर्थात् कफ की अधिकता हो तो मुलेठी का क्वाथ पिलाने के द्वारा वमन कराने के योग्य होते हैं ।। ❖ ऊर्ध्वरक्ती=यस्य नासाक्षिकर्णारस्यमार्गै रक्तं प्रवर्त्तते सः । भक्त रूक्षकर्कशद्रव्यो-'दुश्छर्द्यः' । मधुकस्थाने मधूकेति द्वितीयः पाठः ।।७-१०।। यहाँ 'ऊर्ध्वरक्ती' पद का 'जिनके नाक, आँख, कान तथा मुख की राह से रक्त गिरता हो' 'दुश्छर्द्यः' पद का 'जो रूक्ष तथा कठिन द्रव्य खा लिये हों' यह अर्थ तथा 'मधुक' पद के स्थान में मधूक (महुआ) यह दूसरा पाठ है यह भी समझना चाहिये ।।७-१०।।