भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०३८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ सुश्रुत महर्षि के वचनानुसार 'गलादिक' में आदि शब्द से 'गण्डस्थल तथा कपोल का भी ग्रहण किया गया है' ॥२६-२८॥ अथ गण्डूषभेदानाह- चतुर्विधः स्याद् गण्डूषः स्नेहनः शमनस्तथा। शोधने रोपणश्चैव कवलश्चापि तादृशः ॥२९॥ स्निग्धोष्णैः स्नैहिको वाते स्वादुशीतैः प्रसादनः। पित्ते कट्वम्ललवणैरुष्णैः संशोधनः कफे ।। कषायतिक्तमधुरैः कटूष्णो रोपणो व्रणे ।।३०।। गण्डूष के भेद-(१) स्नेहन, (२) शमन, (३) शोधन और (४) रोपण इन भेदों से गण्डूष और इसी भाँति कवल भी चार प्रकार का होता है। वातसम्बन्धी दोष में स्निग्ध तथा उष्ण द्रवपदार्थों के द्वारा जो गण्डूष धारण किया जाता है उसे स्नैहिक (स्नेहन) कहते हैं। पित्त सम्बन्धी दोष में स्वादिष्ट तथा शीतल द्रव पदार्थों से गण्डूष धारण किया जाता है उसे प्रसादन (शमन) और कफसम्बन्धी दोष में कटु, अम्ल तथा लवणरसयुक्त उष्ण द्रवपदार्थों से जो गण्डूष धारण किया जाता है उसे संशोधन एवं व्रण में कषाय, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त किञ्चित् उष्ण द्रव पदार्थों से जो गण्डूष धारण किया जाता है उसे रोपणसंज्ञक गण्डूष कहते हैं ॥२९-३०॥ अथ गण्डूषकवलौषधमानमाह- दद्याद् द्रव्येषु चूर्णश्च गण्डूषे कोलमात्रकम्। कर्षप्रमाणः कल्कश्च कवले दीयते बुधैः ।।३१।। गण्डूष तथा कवल की ओषधियों का मान-गण्डूष धारण करना हो तो द्रव पदार्थों में डालने के लिये चूर्ण की मात्रा १ कोल (३ माशे) की होनी चाहिये। यदि कवल लेना हो तो उसमें कल्क की मात्रा १ कर्ष (१ तोला) की होनी चाहिये ।।३१।। अथ गण्डूषकवलयोरवस्थामर्यादामाह- धार्यन्ते पञ्चमाद्वर्षाद्गण्डूषाः कवलादयः ।।३२।। गण्डूष तथा कवल धारण करने में अवस्था की मर्यादा-५ वर्ष की अवस्था हो जाने के बाद गण्डूष तथा कवल आदि धारण करना उचित होता है ॥३२॥ व्याधेरपचयस्तुष्टिर्वैशद्यं वक्त्रलाघवम्। इन्द्रियाणां प्रसादश्च गण्डूषे विधृते भवेत् ।।३३।। हरेदास्यस्य वैरस्यं शोषं पाकं व्रणं तृषाम्। दन्तचालञ्च गण्डूषो वैशद्यं तु करोति हि ।।३४।। गण्डूष धारण के गुण-गण्डूष धारण करने पर व्याधियों का नाश, चित्त में सन्तोष, स्वच्छता, मुख में लघुता तथा इन्द्रियों की प्रसन्नता ये सब उत्पन्न होते हैं और मुख की विरसता, शोष (मुख का सूखना) तथा पाक (मुख का पक जाना) दूर होता है एवं व्रण, तृषा और दाँतों का हिलना ये सब नष्ट हो जाते हैं और मुखादि की स्वच्छता भी होती है ।।३३-३४।। अथ कवलविधिमाह- वातपित्तकफघ्नस्य द्रव्यस्य कवलं मुखे। अर्द्ध निक्षिप्य संचर्व्य निष्ठीवेत्कवले विधिः ।।३५।। कवलः कुरुते काङ्क्षां भक्ष्येषु हरते कफम्। तृष्णां शोषञ्च वैरस्यं दन्तचालञ्च नाशयेत् ।।३६।। कवलधारण की विधि-योग्यतानुसार वात, पित्त तथा कफनाशक ओषधियों का कवल (ग्रास) मुख के अर्ध भाग में रखकर और उसे चबा कर थूक देना चाहिये। इसी को कवलधारण की विधि कहते हैं। कवल धारण के गुण- कवलधारण करने से भक्ष्य पदार्थों के खाने में रुचि उत्पन्न होती है और कफ नष्ट होता है एवं तृषा, मुख का शोष (सूखना) तथा विरसता और दाँतों का हिलना दूर हो जाता है ।।३५-३६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA