भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1091, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1091

१०४० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कफमेदोवृते वाते कोष्णं गेहं रवेः करान्। नियुद्धं मार्गगमनं गुरु प्रावरणं ध्रुवम्।।४३।। चिन्ताव्यायामभारांश्च सेवेतामयमुक्तये । येषां नस्यं प्रदातव्यं बस्तिश्चापि हि देहिनाम्।।४४।। शोधनीयाश्च ये केचित् पूर्वं स्वेद्याश्च ते मताः । स्वेद्या ऊर्ध्वं त्रयोऽपीह भगन्दर्यशस्सस्तथा ।।४५।। अश्मर्या चतुरो जन्तुः शययेच्छस्त्रकर्मणः ।।४६।। कफ तथा मेद से युक्त यदि वायुसम्बन्धी रोग हो तो उसकी निवृत्ति के लिये रोगी को किंचिद् गर्म गृह में रखना, सूर्य की किरणों का सेवन कराना एवं मल्ल युद्ध (कुश्ती लड़ना), पैदल रास्ता चलना, भारी मोटा वस्त्र ओढ़ना, चिन्ता करना, व्यायाम (कसरत) तथा भार उठाना इन सबों को यथायोग्य कराना चाहिये । जिन रोगियों को नस्य (नास) या बस्ति देना हो अथवा वमन-विरेचन द्वारा शोधन करना हो उन सबों को सर्व प्रथम स्वेद देना चाहिये । भगन्दर, अर्श तथा पथरी से पीड़ित रोगी शस्त्रकर्म (चीर-फार) के पहले तथा पीछे स्वेद देने के योग्य होते हैं ।।४३-४६।। ❖ शस्त्रकर्मण ऊर्ध्वं पश्चाच्चेति सुश्रुते ।।४३-४६।। यहाँ 'शस्त्रकर्म के पहले तथा पीछे स्वेद देना' यह सुश्रुत में कहा हुआ है ।।४३-४६।। पश्चात्स्वेद्या हृते शल्ये मूढगर्भंगदे तथा । काले प्रजाताऽकाले वा पश्चात्स्वेद्या नितम्बिनी ।।४७।। सर्वान्स्वेदान्निवाते च जीर्णेऽन्ने वाऽवचारयेत् । स्वेदाद्धातुस्थिता दोषाः स्नेहक्लिन्नस्य देहिनः ।।४८।। द्रवत्वं प्राप्य कोष्ठान्तर्गत्वा यान्ति विरेकताम् । स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चक्षुषी । स्वेद्यमानशरीरस्य हृदयं शीतलः स्पृशेत् ।।४९।। स्त्री के मूढ़गर्भ रोग में, शल्य निकाल लेने के पश्चात् स्वेद देना उचित होता है एवं समय होने पर असमय में ही प्रसव होने के बाद प्रसूता स्त्री को स्वेद देना चाहिये । भोजन किये हुये अन्न के पच जाने पर वायुरहित स्थान में पूर्वोक्त सभी स्वेद देना चाहिये । स्नेह (तैलादि) से अभ्यङ्ग (मालिश) कर चुकने पर रोगी को स्वेद देने से धातु (रस—रक्तादि) गत वातादि दोष द्रवित होकर कोठे के अन्दर जाकर विरेकता को प्राप्त होते हैं अर्थात् सम्पूर्ण दोष बाहर निकल जाते हैं। रोगी के शरीर में प्रथम स्नेह (तैलादि) की खूब मालिश करके पश्चात् उसके दोनों नेत्रों को शीतल गीले वस्त्र आदि से ढक कर स्वेद देना चाहिये । स्वेद देते समय उसके हृदय को भी शीतल गीले वस्त्रादि से स्पर्श कराते रहना चाहिये ।।४७-४९।। ❖ शीतलैः=आर्द्रवस्त्रादिभिः ।।४९।। यहाँ 'शीतलैः' पद का 'शीतल गीले वस्त्र आदि से' यह अर्थ समझना चाहिये ।।४७-४९।। अजीर्णी दुर्बली मेही क्षतक्षीणः पिपासितः ।।५०।। अतिसारी रक्तपित्ती पाण्डुरोगी तथोदरी । मेदस्वी गर्भिणी चैव न हि स्वेद्या विजानता ।। स्वेद के अयोग्य व्यक्ति-जिसे अजीर्ण हुआ हो या जो दुर्बल, मेहरोग युक्त, क्षत से क्षीण, प्यासा, अतीसार, रक्तपित्त, पाण्डुरोग, उदररोग किंवा मेदरोग से पीड़ित हो अथवा जो गर्भिणी स्त्री हो उसे जान बूझ कर कभी भी स्वेद नहीं देना चाहिये ।।५०-५१।। स्वेदादेषां याति देहो विनाशं, नो साध्यत्वं यान्ति तेषां विकाराः ।।५२।। एतानपि मृदुस्वेदैः स्वेदसाध्यानुपाचरेत् । मृदुस्वेदं प्रयुञ्जीत तथा हृन्मुष्कदृष्टिषु ।।५३।। अतिस्वेदात्सन्धिपीडा दाहस्तृष्णा क्लमो भ्रमः । पित्तासृक्पिडकाकोपस्तत्र शीतैरुपाचरेत् ।। उक्त रोगियों को यदि स्वेद दिया जाय तो उनका शरीर नष्ट हो जाता है तथा उन सबों के रोग भी साध्य कोटि के (शीघ्र अच्छे होने योग्य) नहीं रह जाते हैं । यदि इन लोगों को स्वेद द्वारा शान्त होने योग्य रोग उत्पन्न हो जायें तो मृदु स्वेद द्वारा उनका उपचार करना उचित होता है । हृदय, अण्डकोश तथा नेत्र इनमें यदि स्वेद देना हो तो मृदु स्वेद CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 1091, कुल 1167 में से · BharatKosha