भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४९ अथ रक्तस्रावस्य विषयानाह- शोथे दाहेऽङ्गपाके च रक्तवर्णेऽसृजः स्रुतौ ।। वातरक्ते तथा कुष्ठे सपीडे दुर्जयेऽनिले । पाण्डुरोगे श्लीपदे च विषदुष्टे च शोणिते ।। १२३ ।। ग्रन्थ्यर्बुदापचीक्षुद्ररोगाधिमन्थकाभिधे । विदारीस्तनरोगेषु गात्राणां सादगौरवे ।। १२४ ।। रक्ताभिष्यन्दतन्द्रायां पूतिघ्राणास्यदाहके । यकृत्प्लीहविसर्पेषु विद्रधौ पिडकोद्गमे ।। १२५ ।। कर्णौष्ठघ्राणवक्त्राणां पाके दाहे शिरोरुजि । उपदंशे रक्तपित्ते रक्तस्रावः प्रशस्यते ।। १२६ ।। रक्तस्राव के विषय-शोथ, दाह, अङ्गों का पकना तथा लाल रङ्ग का होना, नाक आदि से रक्त का गिरना, वातरक्त, कुष्ठ, पीड़ा के सहित वायु का दुर्जय होना, पाण्डुरोग, फीलपाँव, विष से रक्त का दूषित हो जाना, गाँठ, अर्बुद, अपची नामक गले की गाँठ, क्षुद्ररोग, अधिमन्थ, विदारी, स्तनसम्बन्धी रोग, अङ्गों में शिथिलता तथा गुरुता होना, रक्तसम्बन्धी अभिष्यन्द, तन्द्रा, नाक से दुर्गन्ध निकलना, मुख में दाह होना, यकृत्, प्लीहा, विसर्प, विद्रधि, पिडका (फुंसी) निकलना, कान, ओठ, नाक या मुख का पकना या इनमें दाह होना, सिरदर्द, उपदंश (गर्मी) तथा रक्त पित्त इन सब रोगों में रोगी का रक्त निकालना उत्तम होता है ।।१२३-१२६।। अथ रक्तस्रावस्य साधनान्याह- एषु रोगेषु शृङ्गैर्र्वा जलौकाऽलाबुकैरपि । अथवापि सिरामोक्षैः कारयेद्रक्तपातनम् ।। १२७ ।। रक्तस्राव के साधन-उपर्युक्त सब रोगों में सींग, जोंक या तुम्बी लगवाकर अथवा सिरामोक्षण कराकर (नस कटवा कर) रक्त निकालना चाहिये ।।१२७।। अथ सिरामोक्षणानर्हजमानाह- न कुर्व्वीत सिरामोक्षं कृशस्यातिव्यवायिनः । क्लीवस्य भीरोर्गर्भिण्याः सूतायाः पाण्डुरोगिणः ।। पञ्चकर्मविशुद्धस्य पीतस्नेहस्य चार्र्शसाम् । सर्वाङ्गशोथयुक्तानामुदरश्वासकासिनाम् ।। १२९ ।। आघातात्स्रुतरक्तस्य सिरामोक्षो न शस्यते ।। १३१ ।। सिरामोक्षण के अयोग्य जन-जो लोग कृश शरीर वाले अथवा अधिक मैथुन करने वाले हों या नपुंसक वा डरपोक हों अथवा जो गर्भिणी या प्रसूता स्त्री हो किं वा जो पाण्डु रोगी हों या वमनादि पञ्चकर्म द्वारा शुद्ध हुए हों वा स्नेहपान किये हों वा जो अर्श (बवासीर), सर्वाङ्गशोथ, उदररोग, श्वास, खाँसी, वमन तथा अतीसार इनमें से किसी से युक्त हों या जिनको अधिक स्वेदन दिया जा चुका हो अथवा जो १६ वर्ष से कम या ७० वर्ष से अधिक अवस्था वाले हों किं वा जिनका चोट आदि लगने से रक्त निकल गया हो, ऐसे लोगों का सिरामोक्षण करना उचित नहीं होता है ।।१२८-१३१।। ❖ आघातात् स्रुतरक्तस्य=रक्तपित्तादिना च गतरक्तस्य ।। १२८-१३१।। यहाँ 'जिन्हें चोट आदि लगने से रक्त निकल गया हो' ऐसा कहने से 'रक्तपित्त आदि से भी जिनका रक्त निकल गया हो' उनका भी बोध करना चाहिये ।। १२८-१३१।। एषां चात्ययिके रोगे जलौकाभिर्वनिहरेत् । तथा च विषजुष्टानां सिरामोक्षो न शस्यते ।। १३१ ।। गोशृङ्गेण जलौकाभिरलावूभिरपि त्रिधा । वातपित्तकफैर्दुष्टं शोणितं स्रावयेद् बुधः ।। १३३ ।। द्विदोषाभ्यान्तु दुष्टं यत्त्रिदोषैरपि दूषितम् । शोणितं स्रावयेद्युक्त्या सिरामोक्षैः पदैस्तथा ।। १३४ ।। गृह्णाति शोणितं शृङ्गंदशाङ्गुलमितं बलात् । जलौका हस्तमात्रं तु तुम्बी तु द्वादशाङ्गुलम् ।।१३५।। पदमङ्गुलमात्रस्य सिरा सर्वाङ्गशोधिनी । शीते निरन्ने मूर्च्छान्निद्राभीतिमदश्रमैः ।। १३६ ।। युक्तानां न स्रवेद्रक्तं तथा विण्मूत्रसङ्गिनाम् । शोणिते चाप्रवृत्ते तु कुष्ठत्रिकटुसैन्धवैः ।। १३७ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA