भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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विषय-सूची १७ पृष्ठ | पृष्ठ रात्रि में सोने तथा जागने के गुण-दोष १५४ | चिकित्सा की विधि १६६ सुखपूर्वक नींद आने के लिये औषध १५४ | बिना समझे चिकित्सा करने में दोष १६७ उषाकाल (सूर्योदय के पूर्व) जल पीने के गुण १५४ | रोग तथा औषध दोनों का ज्ञान उषःकाल में नासिका से जल पीने के गुण १५५ | होने पर गुण १६७ नासाजलपान में जल का परिमाण १५५ | चिकित्सा करने की पद्धति १६८ नासा जलपान के विशेष गुण १५६ | अतिरिक्त तथा हीन चिकित्सा का निषेध १६९ नासा जलपान के अयोग्य जन १५६ | परस्पर भिन्न स्वरूपवाली चिकित्साओं ऋतुभेद और ऋतुचर्या १५६ | का एकत्र विधान १६९ दक्षिणायन तथा उत्तरायण के लक्षण और गुण १५७ | चिकित्सा करने से फल १७० ऋतुओं के गुण-दोष १५७ | धनियों से धन लेकर चिकित्सा का विधान १७० ऋतुभेद से दोषों के उपचयापचयादि १५७ | निःशुल्क चिकित्सा कराने में दोष १७० अकाल दोषों की वृद्धि १५९ | वैद्य की चिकित्सा वृद्धि का प्रसार १७० दोषों के चय होने के लक्षण १५९ | रोगी के लक्षण १७१ वर्षा ऋतु के नियम १६० | चिकित्स्य रोगी के लक्षण १७१ शरद् ऋतु के नियम १६० | अचिकित्स्य रोगी के लक्षण १७१ हेमन्त ऋतु के नियम १६१ | अचिकित्स्य रोगियों की चिकित्सा का निषेध १७२ शिशिर ऋतु के नियम १६१ | दूत के लक्षण १७२ वसन्त ऋतु के नियम १६२ | दूत के शकुन विचार १७३ ग्रीष्म ऋतु के नियम १६२ | चिकित्सक के लक्षण १७३ ऋतुचर्याओं का आचरण करने से लाभ १६२ | निषिद्ध वैद्य के लक्षण १७३ ६. मिश्रप्रकरण | वैद्य का कर्तव्य १७४ रोग के लक्षण १६३ | आगन्तुक हेतु १७५ चार प्रकार के रोग १६३ | रोगी के प्रथम आयु का विचार १७६ व्याधियों के भेद १६३ | दीर्घायु रोगी के लक्षण १७६ कर्मज व्याधि १६३ | स्वल्प आयुवाले रोगियों के लक्षण १७६ दोषज व्याधि १६४ | गतायु को ओषधि से लाभ नहीं होने के कारण १७९ कर्म तथा दोष दोनों से उत्पन्न व्याधि १६४ | चिकित्सा में द्रव्य की आवश्यकता १८१ कर्मजादि रोगों के क्षीण होने के कारण १६४ | रोगी की परिचर्या करने वाले (परिचारक) साध्यादि भेद से तीन प्रकार के रोग १६५ | का लक्षण १८१ याप्य के लक्षण १६५ | औषध के लक्षण १८१ साध्य-याप्य रोगों से युक्त रोगी की | औषध ग्रहण करने की परिभाषा १८१ आवश्यक चिकित्सा १६५ | औषधियों की परीक्षा १८४ उपद्रव के लक्षण १६५ | स्वभावतः हितकारक द्रव्य १८५ अरिष्ट के लक्षण १६५ | स्वभावतः अहितकर द्रव्य १८६ चिकित्सा के लक्षण १६५ | २ भाव.I