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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२५२ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) आध्मान, शूल तथा पाचन के विकारों में इसको मद्यसार के साथ देते हैं। (३) इसका तैल उत्तेजक, मूत्रल तथा वातानुलोमक है एवं इसका उपयोग कटिशूल, आध्मान तथा शूल में किया जाता है। उत्सर्ग के समय प्रत्याक्षेप क्रिया द्वारा यह गर्भाशय का संकोच करता है इसलिए आर्तवस्राव वृद्धि के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसके बाह्य प्रयोग से चर्म में प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। वृक्क रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (४) इसका काष्ठ स्वेदल है तथा ग्वायकम और सासाफ्रास के बदले में प्रयुक्त होता है। (५) हाऊबेर का रस एक अच्छा उपसर्ग नाशक है। स्थूलांत्र दण्डाणु (बी. कोलाइ) जैसे जीवाणुओं का भी यह नाश करता है। इसके धूम्र का व्यवहार किया जाता है तथा यह मांस तथा मद्यों के संरक्षण के लिये भी प्रयोग में आता है। जानपदिक संक्रामक रोगों के मरक (Pestilence) को रोकने की दृष्टि से यह उपयोगी समझा जाता है। मरक के समय इसके चूर्ण का दैनिक सेवन करने से व्याधि का प्रतिषेध होता है। (६) बच्चों के राजयक्ष्मा में इसको पकाकर देने से भूख बढ़ती है, वजन बढ़ता है और लाभ होता है। (७) इसके चूर्ण को आमवातादि में संधियों तथा सूजन पर मलते हैं। (८) यह 'जिन' आदि आपानक मद्यों के निर्माण के लिये यूरोप में व्यवहार में आता है। मात्रा—चूर्ण २-६ ग्रा.। तैल- ½ से १ बूँद पाचक, ४-६ बूँद मूत्रल। स्पिरिट (२० में १) २०-६० बूँद। फांट-२-३ औंस। अथ विडङ्गस्य नामानि गुणाँश्चाह पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः । तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ।।१११।। विडङ्गं कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ।।११२।। वायविडङ्ग के नाम तथा गुण—'विडङ्ग' (यह शब्द पुल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग दोनों ही में व्यवहृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब वायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं। वायविडङ्ग— कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्निवर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है। [१११-११२] ३५. वायविडङ्ग प्रायः सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित् लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं, किन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आजकल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं है बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' को उपयोग में लेना चाहिये। कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही वायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार वायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं है और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है। प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न, अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अतः इसी का व्यवहार औषधि-कार्यों में करना चाहिए। हिं०-वायविडङ्ग, भाभिरंग, बाबिरंग। बं०-विरंग। म०-वावडिङ्ग। गु०-वावडीङ्ग। क०-वायुविडङ्ग, वायबिलंग। ते०-वायुविडंघमु। ता०-वायुविलंगम। पं०-बबरंग, वाबरंग। मा०-वायविरंग। सिंहली०-उम्बेलिया, अम्बेलिया।- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA