भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः २७५ (५) पर्यायिकज्वर तथा शीतज्वर में इसको गुडुच के साथ क्वाथ बनाकर देना चाहिये। नित्य इन्द्रजव का चूर्ण खाते रहने से शीतज्वर नहीं आता। (६) पूयदन्त (Pyorrhoea) में मसूढ़ों पर इसके चूर्ण को मलने से रक्तस्राव कम होता है तथा पूय एवं दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा—चूर्ण १-४ माशा भूनकर या १/४-१/२ तो० क्वाथ बनाकर। मीठा इन्द्रयव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ मदनस्य (मैनफल) नामगुणानाह मदनश्छर्दनः पिण्डो नटः¹ पिण्डीतकस्तथा। करहाटो मरुवकः शल्यको विषपुष्पकः ।।१६०।। मदनो मधुरस्तिक्तो वीर्योष्णो लेखनो लघुः । वान्तिंकृद्विद्रधिहरः प्रतिश्यायव्रणान्तकः ।। रूक्षः कुष्ठकफानाहशोथगुल्मव्रणापहः ।।१६१।। मैनफल के नाम तथा गुण—मदन, छर्दन, पिण्ड, नट, पिण्डीतक, करहाट, मरुवक, शल्यक तथा विषपुष्पक ये सब मैनफल के नाम हैं। मैनफल—मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, लेखन, लघु, वमनकारक, विद्रधिरोग को दूर करने वाला, प्रतिश्याय (जुकाम) और व्रण का नाशक, रूक्ष एवं कुष्ठ, कफ, आनाह, शोथ, गुल्म तथा क्षत को दूर करने वाला होता है। [१६०-१६१] ४९ मदन (मैनफल) हिं०—मैनफल, मयनफल। बं०—मैनफल, मयना कांटार गाछ। म०—गेल, गेलफल। गु०—मींढोल, मींढल। क०—मंगरिक्कै। ते०—वसन्त कड़िमि चेट्टु, मण्डचेट्टु, मंगचेट्टु। ता०—मरकलन, पुंगारै। ने०—मैदल। फा०— झुझ-उल्-कुच्। अ०—जौजुल कौसल। अं०—Emetic Nut (एनेटिक नट्), (Bushy Gardenia (वुशी गार्डेनिया)। ले०— Randia dumetorum Lam. (रेंडिया ड्युमेटोरम्)। Fam. Rubiaceae (रूबियेसी)। यह हिमालय के साधारण प्रदेश में जम्मू से पूरब की ओर सिक्कम तथा दक्षिण की ओर चट्टगाँव, खासिया पहाड़, सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष—१-१।। इञ्च लम्बे-लम्बे मजबूत पत्र कोणीय काँटों से भरा हुआ छोटे कद का होता है। छाल— भूरे रङ्ग की लकड़ी—सफेद या भूरे रंग की होती है। पत्ते १-२ इञ्च लम्बे ऊपर से लट्वाकार और क्रमशः पतले होकर पंखयुक्त पत्रनाल में परिवर्तित होते हैं और प्रायः दलबद्ध होकर रहते है। फूल—पाँच पंखड़ी वाले किञ्चित् हरिताभ, सफेद और सुगन्धयुक्त होते हैं। फल—जङ्गली अञ्जीर, सुपारी या अखरोट के आकार के होते हैं और पकने पर पीले पड़ जाते हैं। बीज—बीहीदाने के समान होते हैं। इन्हीं फलों को मैनफल कहते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में सॅपोनिन् (Saponin) तथा ह्वैलिरियानिक् एसिड (Valerianic acid), मोम, राल एवं रञ्जक पदार्थ आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—मैनफल बहुत अच्छा वमन द्रव्य माना गया है। प्राचीन शास्त्रकारों में इसके बीजों को एक विशेष प्रकार से संग्रह कर व्यवहार करने को लिखा है। नये ग्रन्थकार इसके बीज व फल की छाल को वामक नहीं मानते लेकिन इसके गूदे (Pulp) को वामक मानते हैं। डॉ० देसाई प्राचीन मत से सहमत हैं। कुछ भी हो सम्पूर्ण फल वामक अवश्य है। कुछ विद्वान् इसको इपीकाक् का अच्छा प्रतिनिधि बतलाते हैं। इसका उपयोग गर्भपात कराने के लिये किया जाता हैं तथा यह मछलियों के लिये विषैला है। १. 'राठः' इति पाठा. ।

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