भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० भावपादनिशिण्टुः नोट :- सर्पाक्षी का वर्णन गुडूच्यादि वर्ग तथा धवलबरुआ का वर्णन नाकुली में किया गया है। अथ (रास्नाभेदः) नाकुली नामगुणानाह नाकुली सुरसा नागसुगन्धा गन्धनाकुली। नकुलेष्टा भुजङ्गाक्षी सर्पाङ्गी विषनाशिनी ।।१६५।। नाकुली तुवरा तिक्ता कटुकोष्णा विनाशयेत्। भोगिलूतावृश्चिकाखुविषज्वरकृमिव्रणान् ।।१६६।। नाकुलीकन्द के नाम तथा गुण-नाकुली, सुरसा, नागसुगन्धा, गन्धनाकुली, नकुलेष्टा, भुजङ्गाक्षी, सर्पाङ्गी तथा विषनाशिनी ये सब नाम 'नाकुलीकन्द' के हैं। नाकुलीकन्द-कषाय, तिक्त एवं कटुरसयुक्त तथा उष्णवीर्य होता है। और सर्प, मकड़ी, विच्छू तथा मूसा इन सबों के विष को दूर करने वाला एवं ज्वर, कृमि तथा व्रण को भी नष्ट करने वाला होता है। [१६५-१६६] ५१. नाकुली (धवलबरुआ, सर्पगन्धा) हिं०-नकुलकन्द, नाकुलीकन्द, नाई, हरकाई चन्द्रा, रास्नाभेद, छोटाचांद । उड़ीसा, बिहार-धन्नेरना, धनबरुआ, धवलबरुआ, सनोचाडो । बं०-नाकुली, गन्धरास्ना, चन्द्र । म०-अडकई, चन्द्र । - नोलबेल, अमेलपोदी । क०- सूत्रनाभि । ते०-पातालअगंधि । मा०-हरकय । मलया०-चुवन्ना अविलपोरी । फा०-छोटाचान्दा । ले०-Rauwolfia serpentina Benth. ex Kurz. (राँवोल्फिया सर्पेण्टाइना) । Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी) । वैद्य समाज में नकुलचन्द भी एक सन्दिग्ध वनौषधि है। कुछ लोगों ने नाकुली को ले०-एरिस्टोलोकिआ इण्डिका (Aristolochia indica Linn), ईशरमूल लिखा है तथा श्री ठा० बलवन्त सिंह जी भी उनसे सहमत होते हुए सर्पगन्धा नाम भी उसी के (नाकुली) लिये तथा धवलबरुआ के लिए राजनिघण्टु का जम्बू नाम उचित समझते हैं जिसको श्री भगीरथ स्वामी ने माना है। प्राचीन ग्रंथों में केवल सुश्रुत के अमानुषोपसर्गाध्याय में मानसरोगहर अपराजितगण में सर्पगन्धा नाम का उल्लेख मिलता है। यहाँ पर पहले वर्णन 'रावोल्फिया' का दिया जा रहा है जिसके बाद ईश्वरमूल का स्वतन्त्र वर्णन दिया जावेगा। धवलबरुआ के क्षुप हिमालय के निचले प्रदेशों में सरहिन्द से लेकर पूर्व में आसाम तक विशेष कर देहरादून, सिवालिक पहाड़ी भाग तथा रोहिलखण्ड, उत्तरी अवध और गोरखपुर के हिमालय के निचले भाग में ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं कोंकण, उत्तरी कनारा, दक्षिणी महाराष्ट्र प्रान्त, मद्रास के पूर्वी तथा पश्चिमी घाट में ३००० फीट तक और बिहार के अनेक भाग में जैसे पटना, भागलपुर तथा उत्तरी एवं मध्य बंगाल, वर्मा, श्याम और जाबा आदि स्थानों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप-छोटा, आकर्षक, १ से २ फीट ऊँचा क्वचित् ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्र-हरे, चमकीले, ३-७ इञ्च लम्बे, १।।-२।। इञ्च चौड़े, भालाकार या व्यस्तभालाकार, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र, आधार की ओर पतले होकर १/२ इञ्च पत्रनाल से युक्त एवं टहनी के प्रत्येक गाँठ पर ३-४ के चक्रों में (Whorled)। पुष्प-श्वेत या साधारण गुलाबी गुच्छों में, २-४ इंच लम्बे पुष्प दण्डों पर। फल-छोटे, मांसबैं एक या दो-दो जुड़े हुये पकने पर बैंगनी काले । मूल-सर्प की तरह टेढ़ा-मेढ़ा, करीब १६ इञ्च तक लम्बा, पौन इ० मोटा, खुरदरा, कुछ-कुछ झुर्रियों से युक्त, शाखाओं से युक्त और उस पर लम्बाई में धारियाँ रहती हैं। इसे तोड़ने पर भग्न छोटा एवं अनियमित । मूल की छाल धूसरित पीत (Greyish yellow) तथा अन्दर का काष्ठ श्वेताभ । स्वाद में अत्यन्त कड़वा तथा गन्धहीन । इसके मूल को तोड़कर कटे भाग पर २ भाग शोरे का तेजाब (Nitric acid) और १ भाग जल मिले घोल के २ बूँद डालने से मेड्युलरी रेज् (Medullary rays) विशेष कर अन्तःचर्म (Cortex) के पास वाले भाग रंगीन हो जाते हैं। इस क्षुप के ३- ४ साल पुराने पौधे के मूल को शरद्काल में संग्रह कर छाल सहित सुखाकर व्यवहार में लाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA